कृष्ण जन्माष्टमी व्रत के क्या नियम हैं?
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कृष्ण जन्माष्टमी व्रत के क्या नियम हैं?

व्रत को सफल और फलदायी बनाने के लिए किन नियमों का पालन जरूरी है? जानिए जन्माष्टमी उपवास से जुड़ी धार्मिक और शास्त्रीय परंपराएं।

जन्माष्टमी व्रत नियम के बारे में

जन्माष्टमी व्रत में ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें। व्रती दिनभर निराहार या फलाहार रहते हैं। व्रत के दौरान सात्त्विकता बनाए रखें, मन वचन से संयम रखें। रात को जागरण करें और मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाकर व्रत पूर्ण करें।

कृष्ण जन्माष्टमी व्रत के नियम

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का पावन पर्व है, जो हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के आठवें अवतार माने जाते हैं। यह दिन उनके प्रेम, करुणा और ज्ञान से जुड़े संदेशों को याद करने और अपनाने का एक सुंदर अवसर है। भगवान कृष्ण का जन्म अधर्म और अत्याचार को समाप्त करने और धर्म की स्थापना के लिए हुआ था इसलिए जन्माष्टमी न सिर्फ एक धार्मिक उत्सव है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक एकता और परंपरा का भी प्रतीक है। भारत ही नहीं, दुनियाभर में कृष्ण भक्त इस दिन व्रत, कीर्तन और जागरण कर भगवान की भक्ति में लीन रहते हैं। तो आइए जानें, आखिर क्यों इतना खास है श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का यह पावन व्रत, क्या है इसका आध्यात्मिक महत्व और कौन-कौन से नियमों का पालन करना होता है जो इसे बनाते हैं और भी शुभ और प्रभावशाली।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है । यह वही शुभ दिन है जब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में धरती पर अवतार लिया था। इस दिन भक्तगण पूरे श्रद्धा भाव से उपवास रखते हैं, व्रत करते हैं और दिन-रात भजन, कीर्तन, कथा व पूजा-अर्चना में लीन रहते हैं। यह व्रत पापों के नाश, आध्यात्मिक शुद्धि और भगवान श्रीकृष्ण के आशीर्वाद की प्राप्ति के लिए अत्यंत फलदायक माना गया है। जन्माष्टमी व्रत से न केवल सुख, शांति और समृद्धि मिलती है, बल्कि यह हमारे भीतर के अहंकार, लोभ और मोह को भी मिटाता है। यह आत्मा को शुद्ध कर भगवान कृष्ण से गहरा जुड़ाव स्थापित करने का माध्यम बनता है। यह पर्व न केवल भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव है, बल्कि उनके जीवन मूल्यों, उपदेशों और भक्ति की भावना को आत्मसात करने का भी अवसर है।

इस वर्ष (2025) श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व 16 अगस्त (शनिवार) को मनाया जाएगा, और इसी दिन देश-विदेश में लाखों भक्त उपवास रखकर भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव का उल्लासपूर्वक स्वागत करेंगे। आइए आगे जानें श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत कैसे किया जाता है? क्या हैं वे नियम और विधियां, जो इस व्रत को पूर्ण और फलदायक बनाती हैं?

व्रत कैसे करें?

  • ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान कर शरीर और मन को शुद्ध करें।
  • स्वच्छ और सात्विक वस्त्र धारण करें।
  • घर और पूजा स्थान की साफ-सफाई करें।
  • व्रत का संकल्प लें, चाहे वह फलाहार (फल, दूध आदि) हो या जलाहार (केवल जल)। कुछ श्रद्धालु निर्जल उपवास भी करते हैं।

पूजा सामग्री

  • चौकी और बिछाने के लिए स्वच्छ पीला कपड़ा
  • लड्डू गोपाल (बाल कृष्ण) की प्रतिमा या झूले में बिठाने योग्य मूर्ति
  • आम की लकड़ी (मंडप सजाने हेतु), मोरपंख, मुकुट और आभूषण
  • गंगाजल, जल पात्र, पंचामृत (दूध, दही, शहद, घी, शक्कर), खीरा
  • चंदन, कुमकुम, केसर, अक्षत (चावल), फूल, तुलसी दल और माला
  • दीपक, धूप, कपूर, अगरबत्ती, घी, मौली, नारियल, सुपारी
  • भोग हेतु मक्खन, मिश्री, फल, माखन-शक्कर, धनिया पंजीरी आदि

पूजा विधि

  • चौकी पर स्वच्छ कपड़ा बिछाकर भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करें।
  • गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक करें।
  • भगवान का सुंदर वस्त्रों, आभूषणों, मोरपंख, और मुकुट से शृंगार करें।
  • उन्हें झूले पर विराजमान करें और झूला झुलाएं।
  • धूप-दीप प्रज्वलित करें, तिलक करें और अक्षत चढ़ाएं।
  • पुष्प, तुलसी पत्र और मालाएं अर्पित करें।
  • पूजन कथा पढ़ें और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करें।
  • मध्यरात्रि (12 बजे) श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाएं – शंख, घंटी और जयकारों के साथ आरती करें।
  • भगवान को भोग अर्पित करें — खासकर माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी और फल।
  • अगले दिन, जब अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का योग समाप्त हो जाए, तब व्रत का पारण करें।

जन्माष्टमी पूजा के नियम

  • व्रत के दिन मानसिक, शारीरिक और वाणी की पवित्रता बनाए रखें।
  • इस दिन अन्न या अन्न से बने किसी भी पदार्थ का सेवन वर्जित होता है। केवल फलाहार, दूध, या निर्जल व्रत का पालन किया जाता है।
  • व्रत के दिन दिन में सोना निषेध माना गया है। दिन भर ध्यान, पूजा और भजन-कीर्तन में समय व्यतीत करें।
  • भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में होता है, इसलिए व्रत का पारण 12 बजे के बाद ही करें।
  • व्रत का पारण उन्हीं वस्तुओं से करें जो आपने भगवान को भोग स्वरूप अर्पित की थीं
  • व्रत पारण से पहले ब्राह्मणों को भोजन कराना और दान देना विशेष पुण्यदायी माना जाता है।
  • इस दिन किसी से कटु वचन न कहें, झगड़ा न करें और मन में कोई बुरा विचार न आने दें।
  • दिन भर श्रीकृष्ण के भजन-कीर्तन, मंत्र जाप और श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करें।
  • जन्माष्टमी के दिन श्रीकृष्ण मंदिर जाकर दर्शन करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।

निष्कर्ष

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक साधना है। यह न केवल शरीर और आत्मा को शुद्ध करता है, बल्कि जीवन में शांति, सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि लाता है। यह पर्व हमें भक्ति, प्रेम और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें और अपना दिव्य आशीर्वाद सदैव आप पर बनाए रखें।

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Published by Sri Mandir·August 4, 2025

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