
हर साल लोहड़ी की तारीख को लेकर लोगों के मन में सवाल रहता है। यह पर्व सूर्य उत्तरायण और फसल से जुड़ा हुआ है। यहाँ जानें लोहड़ी किस तारीख को मनाई जाती है और इसके पीछे की धार्मिक व पारंपरिक मान्यताएँ।
लोहड़ी हर साल 13 जनवरी को मनाई जाती है और यह पंजाबी संस्कृति का प्रमुख त्योहार है। यह त्योहार सर्दियों के अंत और नए फसल सीज़न की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। लोहड़ी के दिन लोग आग जलाकर उसके चारों ओर गाने-बजाने और नृत्य करते हैं। विशेष रूप से तिल, मूंगफली, गुड़ का प्रसाद तैयार किया जाता है। यह दिन खुशियों, समृद्धि और नई उम्मीदों का संदेश देता है।
लोहड़ी का पर्व हर साल 13 जनवरी को मनाया जाता है। यह दिन हिंदू पंचांग के अनुसार मकर संक्रांति से एक दिन पहले आता है। इस समय सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करने की तैयारी में होते हैं और धीरे-धीरे उत्तरायण की शुरुआत होती है।
लोहड़ी के पावन पर्व पर अग्नि प्रज्वलन के लिए प्रदोष काल को सबसे श्रेष्ठ समय माना गया है। इस दिन सूर्य शाम 5 बजकर 28 मिनट पर अस्त होगा। सूर्यास्त के बाद आने वाले दो घंटे का समय लोहड़ी की अग्नि जलाने और विधिपूर्वक पूजा करने के लिए शुभ माना जाता है।
लोहड़ी मनाने के पीछे धार्मिक, सांस्कृतिक और कृषि से जुड़ी कई मान्यताएँ हैं। यह पर्व मुख्य रूप से रबी की फसल से जुड़ा हुआ है। इस समय खेतों में गेहूं की फसल लहलहा रही होती है और किसान अपनी मेहनत का फल देखकर प्रसन्न होते हैं। लोहड़ी उसी खुशी और आभार को प्रकट करने का पर्व है।
धार्मिक मान्यता की बात करें तो अग्नि को हिंदू धर्म में देवता माना गया है, जो जीवन को शुद्ध और ऊर्जावान बनाती है। ऐसे में लोहड़ी की अग्नि में आहुति देकर लोग प्रार्थना करते हैं कि उनके घर में सुख, शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि बनी रहे।
लोहड़ी से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा दुल्ला भट्टी की है, जिसे पंजाब का रॉबिन हुड कहा जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने कई गरीब लड़कियों का विवाह करवाया और उनकी इज्जत की रक्षा की। आज भी लोहड़ी के गीतों में उनका नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है।
लोहड़ी की शाम लोग नए कपड़े पहनते हैं, घरों को सजाते हैं, और सूर्यास्त के बाद शुभ मुहूर्त में अग्नि जलाई जाती है। इसके बाद अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करके तिल, गुड़, रेवड़ी, मूंगफली अर्पित किए जाते हैं। साथ ही लोकगीत गाए जाते हैं और भांगड़ा व गिद्धा किया भी जाता है, फिर आपस में मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं। यह अग्नि देवता और सूर्य देव को धन्यवाद देने का प्रतीक माना जाता है कि उन्होंने अच्छी फसल देकर घर को अन्न से भरपूर रखा।
लोहड़ी के दिन सबसे पहले अग्नि देव की विधिवत पूजा करनी चाहिए और उसमें आहुति अर्पित करनी चाहिए। इससे घर में नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सुख-समृद्धि आती है।
इस दिन दान-पुण्य करना बहुत शुभ माना जाता है। गरीबों और जरूरतमंदों को गर्म कपड़े, कंबल, अनाज या मिठाई दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
ये त्यौहार परिवार और दोस्तों के साथ मिलकर मनाना चाहिए, क्योंकि लोहड़ी पुराने गिले-शिकवे भूलकर रिश्तों में नई गर्माहट भरने का सबसे अच्छा मौका होता है।
इस दिन घर में साफ-सफाई और सजावट करना भी शुभ माना जाता है। इससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है और घर का माहौल खुशहाल बनता है।
लोहड़ी के दिन झगड़ा, विवाद या कटु वचन बोलने से बचना चाहिए। यह पर्व प्रेम और भाईचारे का प्रतीक है, इसलिए मन में किसी के लिए द्वेष नहीं रखना चाहिए।
इस दिन अग्नि का अपमान नहीं करना चाहिए। अग्नि में कोई भी अपवित्र या हानिकारक वस्तु डालने से बचना चाहिए और इसे केवल पूजा और शुभ कार्य के लिए ही इस्तेमाल करना चाहिए।
जरूरत से ज्यादा दिखावा करने से भी बचना चाहिए। त्योहार का असली मतलब आडंबर नहीं, बल्कि सादगी और खुशी बाँटना है।
लोहड़ी के दिन निराशा या नकारात्मक सोच से दूर रहना चाहिए, क्योंकि यह पर्व नई ऊर्जा और नई शुरुआत का प्रतीक है।
लोहड़ी हमें प्रकृति के साथ जुड़ना, सफलता का उत्सव मनाना और अपनों के साथ खुशियाँ बाँटना सिखाती है। इसके साथ ही ये पर्व हमें अपने परिवार, समाज और परंपराओं से जोड़ने का भी काम करते हैं। ‘श्री मंदिर’ की ओर से आप सभी को लोहड़ी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
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