लोहड़ी और बैसाखी में क्या अंतर है
image
downloadDownload
shareShare
ShareWhatsApp

लोहड़ी और बैसाखी में क्या अंतर है? | Lohri aur Baisakhi Me Kya Antar Hai

लोहड़ी और बैसाखी दोनों ही पंजाब के प्रमुख पर्व हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन दोनों में क्या अंतर है? यहाँ जानें लोहड़ी और बैसाखी का महत्व, मनाने की तिथि, रीति-रिवाज और धार्मिक मान्यताओं का स्पष्ट अंतर।

लोहड़ी और बैसाखी पर्व के बार में

लोहड़ी और बैसाखी दोनों ही पंजाब की संस्कृति से जुड़े प्रमुख पर्व हैं, लेकिन इनके समय, उद्देश्य और परंपराएँ अलग-अलग हैं। लोहड़ी सर्दियों के अंत और रबी फसल की शुरुआत का प्रतीक है, जबकि बैसाखी फसल कटाई और नए वर्ष के उत्सव के रूप में मनाई जाती है। इस लेख में जानिए लोहड़ी और बैसाखी के बीच का मुख्य अंतर, उनका धार्मिक महत्व और सांस्कृतिक विशेषताएँ।

लोहड़ी और बैसाखी में क्या अंतर है?

भारत त्योहारों का देश है, जहाँ हर मौसम और फसल के चक्र को उत्सव के रूप में मनाया जाता है। लोहड़ी और बैसाखी दोनों ही उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब और हरियाणा के प्रमुख त्योहार हैं। अक्सर लोग इन दोनों त्योहारों को एक जैसा समझ लेते हैं क्योंकि दोनों ही फसलों और खुशी से जुड़े हैं, लेकिन असल में इनके बीच समय, धार्मिक महत्व और मनाने के तरीके में काफी बड़ा अंतर है, इनके पीछे के कारण, मौसम और परंपराएँ पूरी तरह अलग हैं।

दोनों पर्वों में मुख्य अंतर

1. मनाने का समय और ऋतु

लोहड़ी और बैसाखी इन दोनों त्योहारों के बीच सबसे बड़ा अंतर वह समय है जब इन्हें मनाया जाता है। पहला और स्पष्ट अंतर समय का है।

लोहड़ी: यह त्योहार सर्दियों के अंत का प्रतीक है। यह त्योहार कड़ाके की ठंड के दौरान मनाया जाता है। यह हर साल हिंदू कैलेंडर के अनुसार पौष महीने के अंत में और मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से यह अक्सर 13 जनवरी को आता है। लोहड़ी के अगले दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाता है, जिससे दिन बड़े होने लगते हैं और धीरे-धीरे ठंड कम होने लगती है।

बैसाखी: इसके ठीक विपरीत, बैसाखी वसंत ऋतु के अंत और गर्मियों के आगमन का संकेत है। यह सौर कैलेंडर के अनुसार नए साल की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है। बैसाखी हर साल 13 या 14 अप्रैल को मनाई जाती है। इस समय तक सर्दी पूरी तरह खत्म हो चुकी होती है।

2. फसल चक्र का महत्व

भारत एक कृषि प्रधान देश है, इसलिए यहाँ के त्योहार फसलों से गहराई से जुड़े हैं। यह दोनों ही त्योहार किसानों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन फसलों के चरण अलग-अलग होते हैं।

लोहड़ी (फसल की बढ़त): जनवरी के महीने में किसान गेहूं और सरसों जैसी रबी की फसलों की बुवाई के बाद को फसलों खेतों में लहलहाते हुए देखते हैं। लोहड़ी पर किसान अपनी आने वाली अच्छी फसल के लिए भगवान और प्रकृति का धन्यवाद करते हैं। इसे “बुवाई और विकास” का उत्सव कहा जा सकता है। फसल के बढ़ने की खुशी में यह त्योहार मनाया जाता है।

बैसाखी (फसल की कटाई): यह फसल कटाई का त्योहार है। अप्रैल तक गेहूं की फसल पककर सुनहरी हो जाती है और कटने के लिए तैयार होती है। बैसाखी “कटाई और समृद्धि” का त्योहार है। जब किसान अपनी मेहनत को अनाज के रूप में घर आते देखते हैं, तो वे खुशी से झूम उठते हैं।

3. धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व

लोहड़ी: लोहड़ी के साथ ‘दुल्ला भट्टी’ की कहानी जुड़ी हुई है, जिन्होंने मुगल काल के दौरान गरीब लड़कियों की रक्षा की थी। इसलिए लोहड़ी के गीतों में उनका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। यह त्योहार नवविवाहित जोड़ों और नवजात शिशुओं के लिए भी बहुत खास माना जाता है।

बैसाखी: इसका सिख धर्म में बहुत गहरा ऐतिहासिक महत्व है। 1699 में इसी दिन गुरु गोबिंद सिंह जी ने ‘खालसा पंथ’ की स्थापना की थी। इसके अलावा, यह दिन बौद्ध धर्म में भी महत्वपूर्ण माना जाता है और कई क्षेत्रों में इसे नए साल (बंगाली नव वर्ष, बिहू) के रूप में भी मनाया जाता है।

4. उत्सव मनाने की परंपराएं

दोनों त्योहारों को मनाने का ढंग उनके मौसम के अनुसार बना हुआ है।

लोहड़ी की रस्में: रात के समय खुले आंगन में अलाव (आग) जलाई जाती है। लोग आग के चारों ओर इकट्ठा होते हैं, जिसे ‘लोहड़ी पूजन’ कहा जाता है। आग में तिल, गुड़, रेवड़ी और मक्का अर्पित किया जाता है। परिवार के लोग आग के पास बैठकर मूंगफली खाते हैं और ढोल की थाप पर भांगड़ा करते हैं।

बैसाखी की रस्में: बैसाखी के दिन लोग सुबह जल्दी उठकर पवित्र नदियों या सरोवरों में स्नान करते हैं। गुरुद्वारों में विशेष अरदास और कीर्तन होते हैं। इस दिन जगह-जगह ‘नगर कीर्तन’ निकाले जाते हैं और ‘गतका’ (युद्ध कला) का प्रदर्शन किया जाता है। गाँवों में विशाल मेले लगते हैं जहाँ कुश्ती और अन्य खेल प्रतियोगिताएं होती हैं।

सरल शब्दों में कहें तो, लोहड़ी सर्दियों की विदाई और आने वाली फसल की उम्मीद का त्योहार है, जबकि बैसाखी पकी हुई फसल की कटाई और धार्मिक गौरव का उत्सव है। दोनों ही त्योहार पंजाब की जीवंत संस्कृति और खुशहाली को दर्शाते हैं।

divider
Published by Sri Mandir·January 10, 2026

Did you like this article?

srimandir-logo

श्री मंदिर ने श्रध्दालुओ, पंडितों, और मंदिरों को जोड़कर भारत में धार्मिक सेवाओं को लोगों तक पहुँचाया है। 100 से अधिक प्रसिद्ध मंदिरों के साथ साझेदारी करके, हम विशेषज्ञ पंडितों द्वारा की गई विशेष पूजा और चढ़ावा सेवाएँ प्रदान करते हैं और पूर्ण की गई पूजा विधि का वीडियो शेयर करते हैं।

हमारा पता

फर्स्टप्रिंसिपल ऐप्सफॉरभारत प्रा. लि. 2nd फ्लोर, अर्बन वॉल्ट, नं. 29/1, 27वीं मेन रोड, सोमसुंदरपल्या, HSR पोस्ट, बैंगलोर, कर्नाटक - 560102
YoutubeInstagramLinkedinWhatsappTwitterFacebook