महाशिवरात्रि केवल एक रात्रि नहीं, बल्कि भगवान शिव को समर्पित एक विशेष आध्यात्मिक यात्रा का शिखर मानी जाती है। कालाष्टमी से शुरू होने वाले 7 पवित्र दिन सनातन परंपरा में विशेष महत्व रखते हैं। मान्यता है कि इस अवधि में किए गए जप, पाठ और पूजा जीवन की पुरानी उलझनों को शांत करने और मन को स्थिर करने में सहायक होते हैं।
आज कई लोग ऐसे बोझ महसूस करते हैं जिनका कारण समझ में नहीं आता, जैसे परिवार में बार-बार तनाव, रिश्तों में दूरी, कार्यों में रुकावट या मन में लगातार बेचैनी। शास्त्रों के अनुसार यह स्थिति पुराने कर्म प्रभाव और पीढ़ियों से चले आ रहे संस्कारों से जुड़ी मानी जाती है। जब ये प्रभाव बढ़ जाते हैं, तो घर का वातावरण भी प्रभावित होने लगता है। ऐसे समय में भक्त भगवान सोमेश्वर महादेव की शरण लेते हैं, जिन्हें समय और चंद्र शक्ति का स्वामी माना गया है।
शिव पुराण में बताया गया है कि जब सृष्टि में असंतुलन बढ़ा, तब भगवान शिव स्वयं प्रकट होकर संतुलन स्थापित करने आए। उन्होंने संसार की रक्षा के लिए विष तक को अपने कंठ में धारण किया। इसी प्रकार भक्तों की सच्ची प्रार्थना पर महादेव उनके जीवन की पीड़ा को शांत करने की भावना से जुड़ते हैं। शिव भक्ति में बीते समय की गलतियों से अधिक वर्तमान की श्रद्धा को महत्व दिया जाता है।
कालाष्टमी से महाशिवरात्रि तक सात दिनों का महत्व:
कालाष्टमी से शुरू होकर महाशिवरात्रि तक चलने वाला 7 दिवसीय शिव पुराण पाठ एक क्रमिक साधना माना जाता है। प्रतिदिन पाठ से वातावरण में शांति का भाव बनता है, मन हल्का होता है और भक्त का ध्यान शिव तत्व की ओर बढ़ता है। जैसे-जैसे महाशिवरात्रि नजदीक आती है, साधना की गहराई बढ़ती जाती है।
महाशिवरात्रि की रात्रि रुद्राभिषेक के साथ यह यात्रा पूर्ण होती है। जल, दूध और मधु से शिवलिंग का अभिषेक जीवन की अशांति को शांत करने और स्थिरता की भावना लाने का प्रतीक माना जाता है। यह क्रम व्यक्ति को नई शुरुआत का भाव देता है, जहां मन शांत होता है और जीवन में संतुलन लौटने लगता है।
श्री मंदिर के माध्यम से यह विशेष पूजा भक्तों को कालाष्टमी से महाशिवरात्रि तक एक संपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा का अनुभव कराती है, जहां शांति, संतुलन और नई ऊर्जा की भावना को प्राथमिकता दी जाती है।🙏🕉️