सनातन धर्म में कार्तिक मास का विशेष महत्व होता है, वहीं इस माह में आने वाले त्योहार भी अत्यंत फलदायी होते हैं। कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष में षष्ठी तिथि को देश के कुछ हिस्सों में छठ पूजा मनाई जाती है, वहीं दक्षिण भारत में स्कंद षष्ठी का प्रचलन है। दरअसल छठ पर्व पर सूर्यदेव की आराधना के साथ षष्ठी देवी के पूजन का विशेष महत्व है। हिंदू धर्म में भगवती षष्ठी देवी शिशुओं की देवी हैं। इन्हें छठ मैया भी कहते हैं, जो बच्चों के दाता और रक्षक के रूप में पूजी जाती है। यह वनस्पति एवं प्रजनन की देवी हैं और मान्यता है कि यह बच्चे के जन्म के दौरान सहायता करती हैं। षष्ठी देवी, मूल प्रकृति के छठे अंश से प्रकट हुई, तभी से इनका नाम षष्ठी देवी पड़ा। वहीं दक्षिण भारत में माता षष्ठी को भगवान कार्तिकेय की प्रियतमा यानि पहली पत्नी कहा गया है। लोग यहां माता षष्ठी को देवी देवसेना कहकर पुकारते हैं। माना जाता है कि जिन्हें संतान नहीं होती, उन्हें यह संतान प्राप्ति का आशीष देती है, संतान को दीर्घायु प्रदान करती है। बच्चों की रक्षा करना भी इनका स्वाभाविक गुण धर्म है।
भगवती षष्ठी देवी अपने योग के प्रभाव से शिशुओं के पास सदा वृद्धमाता के रुप में अप्रत्यक्ष रुप से विद्यमान रहती हैं। वह उनकी रक्षा करने के साथ उनका भरण-पोषण भी करती हैं। इनको प्रसन्न करने के लिए लोग कई तरह के अनुष्ठान करते हैं जिसमें पुत्रदा षष्ठी पूजा और गर्भ रक्षाम्बिका हवन भी शामिल है। जहां संतान की खुशहाली एवं रक्षा के लिए पुत्रदा षष्ठी पूजन किया जाता है। वहीं, गर्भ रक्षाम्बिका हवन का भी विशेष महत्व है। माँ गर्भ रक्षाम्बिका, जो कि देवी पार्वती का स्वरूप मानी जाती हैं, उनकी उपासना गर्भवती माताओं एवं शिशु की सुरक्षा हेतु की जाती है। विशेष रूप से दक्षिण भारत में माँ गर्भ रक्षाम्बिका की पूजा संतान प्राप्ति, सुरक्षित प्रसव और माँ तथा शिशु के स्वास्थ्य की रक्षा हेतु अत्यधिक प्रचलित है। इसलिए कार्तिक माह के शुभ अवसर पर स्कंद षष्ठी के दिन तिरुनेलवेली के एट्टेलुथुपेरुमल मंदिर में पुत्रदा षष्ठी पूजा और गर्भ रक्षाम्बिका हवन का आयोजन किया जाएगा। श्री मंदिर के माध्यम से इस पूजा में भाग लें और बच्चों की सुरक्षा और कल्याण के आशीर्वाद के लिए माता षष्ठी से विशेष आशीर्वाद प्राप्त करें।