






महासेवा एक अत्यंत पुण्यदायी और फलदायी सेवा है, जिसका उल्लेख वेद-पुराणों में बार-बार हुआ है। जब किसी व्यक्ति द्वारा भोजन, वस्त्र एवं अन्न जैसे उच्चतम कार्य श्रद्धा और निष्काम भाव से किए जाते हैं, तो उसे महादान कहा जाता है। यह सेवा न केवल दाता के पापों का क्षय करता है, बल्कि पितृ, देवता और ऋषियों को संतुष्ट कर जन्म-जन्मांतर के कर्मबंधन से मुक्ति दिलाता है!
गरुड़ पुराण का स्पष्ट वचन है, पितर पितृलोक में "वायु-रूप" में रहते हैं और पितृ पक्ष में अपने वंशजों के पास आते हैं। पितरों का निवास चंद्रलोक में है और पितृपक्ष के समय वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों ही स्वरूपों में पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी सबसे कम होती है। पूर्णिमा को जब चंद्रमा पूर्ण होता है, पितर सर्वाधिक सक्रिय और ग्रहणशील होते हैं। यह श्रद्धा-विज्ञान है, जब एक वंशज नाम संकल्प लेकर अपने पूर्वज स्मरण करता है, तब उस आत्मा तक निमंत्रण पहुँचता है।
हर मनुष्य पाँच ऋणों के साथ जन्म लेता है। पितृ ऋण उनमें से सबसे बड़ा है। यदि इसे पितृ पक्ष में श्राद्ध-तर्पण से नहीं चुकाया जाता तो यह धीरे-धीरे "पितृ दोष" का रूप ले लेता है। कम या ज़्यादा, कुछ न कुछ पितृ ऋण सभी के जीवन में होता है। किन्तु नियमित पितृकार्य करने वाले परिवारों में यह दोष सक्रिय नहीं होता। जो परिवार कई पीढ़ियों से श्राद्ध नहीं कर रहे उनमें यह दोष प्रभावी हो जाता है।
हाँ बिल्कुल। यह एक सबसे बड़ी गलत धारणा है कि श्राद्ध केवल पुरुष कर सकते हैं। रामायण का प्रमाण: जब राम और लक्ष्मण सामग्री लेने गए, तब माता सीता ने अकेले फल्गु नदी के तट पर राजा दशरथ के लिए पिण्ड दान किया। यह श्राद्ध इतना शक्तिशाली था कि राम का संकल्प-पत्र गवाह बना।"ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्ता गोत्रविग्रहाः" इस श्लोक में स्पष्ट है कि पुत्र न हो तो भी पुत्री या कोई भी वंशज श्राद्ध कर सकता है।
हाँ! श्राद्ध केवल मृत माता-पिता के लिए नहीं दादा-दादी, नाना-नानी, परनाना-परदादा और कुल के किसी भी दिवंगत पूर्वज के लिए होता है। यदि सभी तीन पीढ़ियाँ जीवित हों, तब भी उनके पूर्वज (परदादा आदि) श्राद्ध की प्रतीक्षा में हो सकते हैं। पितृ पक्ष का संकल्प हमेशा "कुल के सभी पितरों के लिए" होता है।