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प्रत्येक माह में दो चतुर्थी होती है। जिन्हें गणेश भगवान की तिथि माना जाता है। अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं। वहीं पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। हिंदू धर्म में गणेश भगवान को सर्वप्रथम पूजनीय माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान गणेश को चतुर्थी तिथि अति प्रिय है, इसलिए चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश की आराधना करना बेहद मंगलमय माना जाता है।
नमस्कार, श्री मंदिर पर आपका स्वागत है। प्रत्येक माह में दो चतुर्थी होती है। जिन्हें गणेश भगवान की तिथि माना जाता है। अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं। वहीं पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। हिंदू धर्म में गणेश भगवान को सर्वप्रथम पूजनीय माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान गणेश को चतुर्थी तिथि अति प्रिय है इसलिए चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश की आराधना करना बेहद मंगलमय माना जाता है।
प्रत्येक माह में दो चतुर्थी होती है। जिन्हें गणेश भगवान की तिथि माना जाता है। अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं। वहीं पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। हिंदू धर्म में गणेश भगवान को सर्वप्रथम पूजनीय माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान गणेश को चतुर्थी तिथि अति प्रिय है इसलिए चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश की आराधना करना बेहद मंगलमय माना जाता है।
मुहूर्त | समय |
ब्रह्म मुहूर्त | 04:53 ए एम से 05:47 ए एम |
प्रातः सन्ध्या | 05:20 ए एम से 06:41 ए एम |
अभिजित मुहूर्त | कोई नहीं |
विजय मुहूर्त | 01:43 पी एम से 02:26 पी एम |
गोधूलि मुहूर्त | 05:12 पी एम से 05:39 पी एम |
सायाह्न सन्ध्या | 05:15 पी एम से 06:35 पी एम |
अमृत काल | 09:23 पी एम से 11:04 पी एम |
निशिता मुहूर्त | 11:31 पी एम से 12:25 ए एम, दिसम्बर 25 |
रवि योग | 06:41 ए एम से 07:07 ए एम |
हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। किसी भी शुभ कार्य, यज्ञ, विवाह या धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत से पहले श्री गणेश की पूजा की जाती है ताकि कार्य निर्विघ्न रूप से सम्पन्न हो सके। हर महीने शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है, जो विशेष रूप से भगवान गणेश को समर्पित होती है।
मान्यता है कि विनायक चतुर्थी पर भगवान गणेश की पूजा अर्चना करने से व्यक्ति को ज्ञान और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही उनकी आराधना करने से जीवन में आ रहे तमाम कष्टों से मुक्ति भी मिलती है। कहा जाता है कि भगवान गणेश विघ्नहर्ता हैं, इनकी उपासना से किसी भी कार्य में आ रही रुकावट दूर हो जाती हैं। इतना ही नहीं विनायक चतुर्थी पर भगवान गणेश की भक्ति करने से व्यापार में भी बरकत होती है। इसलिए हमारे शास्त्र में विनायक चतुर्थी की महिमा का बेहद महत्व है।
पौराणिक काल में भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के किनारे बैठे थे। वहां पर माता पार्वती ने भगवान शिव से समय व्यतीत करने के लिए चौपड़ खेलने को कहा। माता पार्वती की बात सुनकर भगवान शिव चौपड़ खेलने के लिए तैयार हो गए। परंतु प्रश्न ये उठा कि इस खेल के हार और जीत का फैसला कौन करेगा। जिसके बाद भगवान शिव ने कुछ तिनको को एकत्रित करके एक पुतला बनाया और उसमें प्राण-प्रतिष्ठा डाल दी। फिर उस पुतले से कहा- बेटा, हम चौपड़ खेलना चाहते हैं, लेकिन हमारी हार-जीत का फैसला करने वाला कोई नहीं है। इसलिए तुम हमें ये बताना कि हम दोनों में से कौन हारा है और कौन जीता है।
इसके बाद भोलेनाथ और माँ पार्वती का चौपड़ का खेल शुरू हो गया। ये खेल 3 बार खेला गया और संयोग से माँ पार्वती तीनों बार खेल जीत गई। खेल खत्म होने के बाद बालक ने हार-जीत का फैसला किया जिसमें उस बालक ने महादेव को विजयी बताया।
इस गलत निर्णय को देखते हुए, माता पार्वती बालक पर क्रोधित हो गईं और उन्होंने उसे अपंग होने के साथ कीचड़ में पड़े रहने का श्राप दे दिया। इस श्राप को सुनते ही बालक ने माता पार्वती से क्षमा मांगी और कहा कि उससे भूलवश यह गलती हो गई।
बालक की क्षमायाचना सुनने के बाद, माता पार्वती ने उस बालक को श्राप से मुक्त होने का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि, “यहां नागकन्या भगवान श्री गणेश की पूजा करने के लिए आएंगी तब उनके कहे अनुसार तुम गणेश जी का व्रत करना है। ऐसा करने से तुमको श्राप से मुक्ति मिल जाएगी।” यह बताने के बाद शिव और पार्वती जी कैलाश पर्वत पर चले गए।
एक वर्ष तक वह बालक उस श्राप से प्रभावित रहा। वहां जब आखिरकार नागकन्या आईं तो बालक ने उनसे गणेश चतुर्थी व्रत की विधि के बारे में पूछा। पूर्ण विधि के बारे में जानकर, बालक ने भक्ति में लीन होकर 21 दिनों तक भगवान गणेश की आराधना की और व्रत किया। बालक की तपस्या को देखते हुए, भगवान गणेश ने उसे दर्शन दिए और वरदान मांगने के लिए कहा। बालक ने गणेश जी से उसका पैर ठीक करने की प्रार्थना की, जिससे वह कैलाश में माता पार्वती और भगवान शिव से मिल सके। गणेश जी ने उसकी मनोकामना पूरी करते हुए उसे स्वस्थ कर दिया।
कैलाश पहुंचकर उस बालक ने शिव जी को जब इस व्रत के बारे में बताया तो उन्होंने भी माता पार्वती को मनाने और उनका क्रोध दूर करने के लिए यह व्रत किया। जब पार्वती जी को इस व्रत के महत्व के बारे में पता चला तो उन्होंने भी कार्तिकेय जी से मिलने की अपनी इच्छा को पूर्ण करने के लिए पूरे विधि-विधान से इस व्रत को पूरा किया। इसके परिणामस्वरूप, व्रत के 21वें दिन कार्तिकेय जी माता पार्वती से मिलने आ पहुंचे।
इस व्रत की महिमा को देखते हुए तब से लोग विनायक चतुर्थी का व्रत करते आ रहे हैं। इस व्रत को पूरी आस्था व श्रद्धा के साथ करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। बोलो श्री गणेश भगवान की जय!
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