
जानिए इस वैदिक मंत्र का गहरा अर्थ, इसके आध्यात्मिक लाभ और सही जाप विधि। सुख, शांति और कल्याण की कामना के लिए अत्यंत प्रभावशाली मंत्र।
स्वस्ति मंत्र का सनातन परंपरा में विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यह मंत्र शांति, मंगल और कल्याण की कामना का प्रतीक है, जिसे शुभ कार्यों और पूजा के आरंभ में बोला जाता है। इसके उच्चारण से सकारात्मक ऊर्जा और सद्भाव का वातावरण बनता है। इस लेख में जानिए स्वस्ति मंत्र का अर्थ, महत्व और इसका आध्यात्मिक प्रभाव।
स्वस्ति मंत्र, जिसे स्वस्तिवाचन भी कहा जाता है, एक वैदिक मंत्र है जो शुभता, शांति और कल्याण की कामना के लिए किया जाता है। यह किसी भी शुभ कार्य, जैसे पूजा, गृह प्रवेश, या यात्रा की शुरुआत में बोला जाता है ताकि नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो और सभी कार्य सफलतापूर्वक पूरे हों। यह मंत्र देवताओं से आशीर्वाद प्राप्त करने और लोक-कल्याण की कामना के लिए उच्चारित किया जाता है।
स्वस्ति मंत्र का मुख्य भाग है..
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
यह मंत्र ऋग्वेद और यजुर्वेद दोनों में मिलता है। मंत्र में देवताओं से प्रार्थना की जाती है कि वे हमें सुरक्षा, सुख-समृद्धि, दीर्घायु और मंगल प्रदान करें। यह शांति, सौहार्द और सकारात्मक ऊर्जा का आह्वान करता है। विवाह या शुभ कार्यों में इसके उच्चारण से वातावरण पवित्र और शांत हो जाता है।
स्वस्ति वाचन का प्रचलन
स्वस्ति मंत्र का अर्थ है: ‘
कल्याण हो’, जो शुभता और शांति की कामना के लिए बोला जाता है। यह मंत्र वैदिक मंत्रों का समूह है, जिसका जाप किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के शुरुआत में समृद्धि और कल्याण की प्रार्थना करने के लिए किया जाता है।
स्वस्ति मंत्र का पूर्ण अर्थ
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
अर्थ
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