
क्या आप जानना चाहते हैं कि द्वापर युग कब था और इसका अंत कैसे हुआ? इस लेख में आपको द्वापर युग की अवधि, उससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं, प्रमुख घटनाएं और कलियुग के प्रारंभ की पूरी जानकारी सरल भाषा में मिलेगी।
द्वापर युग हिंदू धर्म के चार युगों में तीसरा युग माना जाता है, जो सतयुग और त्रेतायुग के बाद तथा कलियुग से पहले आता है। 2025 के संदर्भ में कुछ लोग मानते हैं कि मानवता आध्यात्मिक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है, इसलिए द्वापर युग की चर्चा बढ़ रही है। हालांकि पारंपरिक मान्यता के अनुसार वर्तमान समय कलियुग ही है, लेकिन जागरूकता और चेतना का विस्तार द्वापर जैसी ऊर्जा का संकेत माना जाता है।
द्वापर युग हिंदू मान्यता के अनुसार चार युगों में तीसरा युग है। इसका आरंभ भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी, गुरुवार के दिन माना गया है। पुराणों के अनुसार इस युग की अवधि लगभग आठ लाख चौसठ हज़ार वर्ष बताई गई है। द्वापर युग को ‘वैश्य युग’ भी कहा जाता है, जिसमें कर्म, युद्ध और संघर्ष का विशेष महत्व रहा।
यह युग मुख्य रूप से महाभारत काल और भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ा हुआ है। इसी समय धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष अपने चरम पर था। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने उपदेशों और कर्मों के माध्यम से मानवता को धर्म, नीति और आध्यात्म का मार्ग दिखाया। अंततः इस युग में अधर्म पर धर्म की विजय हुई, जिससे समाज को सही दिशा मिली।
द्वापर युग माघ माह की कृष्ण अमावस्या से आरंभ हुआ था। इस काल में मनुष्य की औसत आयु लगभग 1000 वर्ष बताई गई है। द्वापर युग का प्रमुख तीर्थ कुरुक्षेत्र माना जाता है, जहाँ धर्म और अधर्म के बीच महान युद्ध हुआ। इसी युग में भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर जन्म लिया और कंस जैसे दुष्टों का संहार कर धर्म की स्थापना की। शास्त्रों के अनुसार, द्वापर युग की अवधि पूरी होने के बाद कलियुग का आरंभ हुआ।
हिंदू शास्त्रों और पुराणों के अनुसार द्वापर युग की कुल अवधि लगभग 8 लाख 64 हजार वर्ष (8,64,000 वर्ष) मानी गई है। यह चार युगों मे —सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग में तीसरा युग था। इस युग में धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष अपने चरम पर था।
द्वापर युग का धार्मिक महत्व बहुत गहरा और व्यापक माना जाता है। यह वह युग था जब धर्म और अधर्म के बीच संतुलन बना हुआ था, लेकिन नैतिक संघर्ष लगातार बढ़ रहे थे। सतयुग की पूर्ण धार्मिकता इस समय कम होने लगी और मनुष्य को सही-गलत के बीच चुनाव करना सीखना पड़ा। इसी कारण द्वापर युग में धर्म की समझ और उसका पालन अधिक महत्वपूर्ण हो गया।
इस युग का सबसे बड़ा धार्मिक आधार भगवान श्रीकृष्ण का अवतार है। उन्होंने अपने जीवन और कर्मों के माध्यम से यह सिखाया कि धर्म केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि कर्तव्य, सत्य और न्याय का मार्ग है। भगवद् गीता में दिए गए उनके उपदेश आज भी मानव जीवन को सही दिशा दिखाते हैं और कर्मयोग, भक्ति तथा ज्ञान का महत्व समझाते हैं। द्वापर युग हमें यह भी सिखाता है कि ईश्वर से जुड़ाव और भक्ति के बिना जीवन अधूरा है।
हिंदू पुराणों के अनुसार द्वापर युग का आरंभ त्रेतायुग के अंत में धर्म की शक्ति कम होने के कारण हुआ। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, मनुष्य की सत्यनिष्ठा, तप, संयम और धर्म के प्रति आस्था घटने लगी। त्रेतायुग में जहाँ धर्म तीन चरणों में स्थित था, वहीं द्वापर युग में वह घटकर दो चरणों पर टिक गया, इसलिए इस युग में धर्म और अधर्म का संतुलन लगभग बराबर हो गया।
पौराणिक कथाओं के अनुसार मनुष्य में अहंकार, मोह, लालच और प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी। लोग भौतिक सुखों की ओर अधिक आकर्षित हो गए और सत्य का पालन कम होने लगा। इसी कारण समाज में अशांति, संघर्ष और युद्ध बढ़े। धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए भगवान विष्णु ने इस युग में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। महाभारत युद्ध और भगवद् गीता का उपदेश द्वापर युग के पौराणिक कारण और उद्देश्य को स्पष्ट करता है, जहाँ भगवान ने कर्म, भक्ति और धर्म के सही मार्ग की स्थापना की।
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार द्वापर युग और कलियुग के बीच जीवन, धर्म और समाज में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। इन दोनों युगों का अंतर निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता हैं।
धर्म की स्थिति - द्वापर युग में धर्म और अधर्म का संतुलन बना हुआ था। कुछ धर्मात्मा राजा न्याय और सद्गुणों की रक्षा करते थे। वहीं कलियुग में धर्म कमजोर हो गया और अधर्म का प्रभाव अधिक बढ़ गया है।
भगवान का अवतार - द्वापर युग में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेकर अधर्म का नाश किया और धर्म की स्थापना की। कलियुग में भगवान का प्रत्यक्ष अवतार नहीं है, बल्कि भक्ति और नाम-स्मरण को मुक्ति का मार्ग बताया गया है।
समाज और शासन - द्वापर युग में कई शासक सत्ता, धन और प्रभाव के लिए युद्ध करते थे, लेकिन कुछ राजा न्यायप्रिय भी थे। कलियुग में धार्मिक और राजनीतिक नेता अक्सर अपने कर्तव्य से भटककर स्वार्थ और अपराध की ओर बढ़ गए हैं।
ज्ञान और धर्म - द्वापर युग में वेदों को चार भागों—ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में विभाजित किया गया और श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश दिया। कलियुग में धर्म के नाम पर छल, दिखावा और पाखंड बढ़ गया है।
आध्यात्मिक स्थिति - द्वापर युग में कुछ लोग ईश्वर से जुड़े रहे और भक्ति व कर्म का संतुलन था। कलियुग में अधिकांश लोग भौतिक लालच, अहंकार और स्वार्थ में उलझ गए हैं।
शांति और जीवन मूल्य- द्वापर युग में संघर्ष और युद्ध थे, फिर भी धर्म की रक्षा होती थी और मंदिरों का निर्माण हुआ। कलियुग में हिंसा, भ्रष्टाचार और पर्यावरण विनाश बढ़ गया है, जिससे संसार में अशांति और कष्ट अधिक हो गए हैं।
द्वापर युग वह काल था जब मानव जीवन में धर्म और अधर्म के बीच गहरा संघर्ष देखने को मिला। द्वापर युग की कथाएँ हमें यह स्मरण कराती हैं कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म का मार्ग छोड़ना नहीं चाहिए। अंततः विजय उसी की होती है, जो सत्य, न्याय और धर्म के मार्ग पर दृढ़ता से चलता है।
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