
इस दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक करके लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं, जबकि भाई अपनी बहनों को उपहार देकर उनका सम्मान करते हैं।
यम द्वितीया हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जिसे भाई दूज के नाम से भी जाना जाता है। यह त्योहार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और खुशहाली के लिए प्रार्थना करती हैं और भाई अपनी बहनों की रक्षा करने का वचन देते हैं। आज के इस खास लेख में हम आपको बताएंगे यम द्वितीया की तिथि एवं शुभ मुहूर्त, साथ ही हम बात करेंगे इस पर्व से जुड़ी कुछ खास मान्यताओं की।
यम द्वितीया कार्तिक मास की द्वितीया तिथि को मनाई जाती है, अर्थात यम द्वितीया दीपावली पूजा के दो दिन बाद पड़ती है। मृत्यु के देवता यमराज के साथ उनके अधीनस्थ चित्रगुप्त और यम-दूत की यम द्वितीया पर पूजा की जाती है। यम पूजा के अतिरिक्त इस दिन को भाई दूज के नाम से भी जाना जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी यमुना ने अपने भाई यमराज को कार्तिक द्वितीया पर अपने घर पर भोजन कराया था। तभी से इस दिन को यम द्वितीया के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो बहनें इस शुभ दिन पर अपने भाइयों को भोजन कराती हैं, वे हमेशा सौभाग्यवती होती हैं और बहनों के घर भोजन करने से भाइयों को लंबी उम्र प्राप्त होती है। इसलिए भाई दूज पर बहनें अपने भाइयों के लिए स्वादिष्ट खाना बनाती हैं और उन्हें अपने हाथों से खिलाती हैं। इस दिन को यम द्वितीया, भाई टीका या भाई दूज के रूप में भारत भर में मनाया जाता है।
मुहूर्त | समय |
ब्रह्म मुहूर्त | 04:24 ए एम से 05:14 ए एम |
प्रातः सन्ध्या | 04:49 ए एम से 06:05 ए एम |
अभिजित मुहूर्त | 11:23 ए एम से 12:08 पी एम |
विजय मुहूर्त | 01:39 पी एम से 02:24 पी एम |
गोधूलि मुहूर्त | 05:25 पी एम से 05:51 पी एम |
सायाह्न सन्ध्या | 05:25 पी एम से 06:41 पी एम |
अमृत काल | 06:57 पी एम से 08:45 पी एम |
निशिता मुहूर्त | 11:20 पी एम से 12:11 ए एम, अक्टूबर 24 |
दोपहर का समय यम द्वितीया पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय है। इस दौरान यमराज पूजा से पहले प्रातःकाल यमुना स्नान का सुझाव दिया जाता है। जिसके बाद पूजा-अर्चना कर के यमराज को अर्घ्य देना चाहिए।
पौराणिक कथा के अनुसार, यमराज अपनी बहन यमुना के घर कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन आए थे। बहन यमुना ने अपने भाई यमराज का आदरपूर्वक स्वागत किया, उन्हें स्नान कराया, तिलक लगाया और अपने हाथों से भोजन कराया। प्रसन्न होकर यमराज ने वचन दिया कि जो भाई इस दिन अपनी बहन के घर जाकर स्नेहपूर्वक भोजन करेगा, उसे नरक का भय नहीं रहेगा और उसकी आयु दीर्घ होगी। तभी से यह परंपरा चली आ रही है और हर वर्ष यह पर्व भाई-बहन के प्रेम और सुरक्षा के व्रत के रूप में मनाया जाता है।
यम द्वितीया के दिन मुख्य रूप से मृत्यु के देवता भगवान यमराज और उनकी बहन यमुना देवी की पूजा की जाती है। इसके साथ ही, चित्रगुप्त जी (जो यमराज के लेखाकार हैं) और यमदूतों की भी पूजा करने का विधान है। इस दिन यमराज की पूजा करने से व्यक्ति को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता और जीवन में आने वाले संकटों से रक्षा होती है, जबकि यमुना देवी की आराधना से जीवन में सुख, सौभाग्य और शुद्धता बनी रहती है।
यम द्वितीया की पूजा में सफाई, पवित्रता और स्नेह का विशेष महत्व है। पूजा की संपूर्ण विधि इस प्रकार है —
प्रातः स्नान एवं तैयारी करें
यमराज और यमुना की प्रतिमाएं स्थापित करें
पूजन सामग्री तैयार करें
यमराज और यमुना देवी की पूजा करें
भाई-बहन पूजा विधि
भोजन का महत्व
अकाल मृत्यु से मुक्ति
दीर्घायु और स्वास्थ्य की प्राप्ति
भाई-बहन के संबंधों में प्रेम और स्नेह की वृद्धि
पितृ दोष से मुक्ति
घर में सुख-शांति और समृद्धि
प्रातःकाल स्नान कर पवित्रता बनाए रखें
यमराज और यमुना देवी की विधिवत पूजा करें
बहन अपने भाई को तिलक लगाकर भोजन करवाए
दान-पुण्य करें
पितरों को याद करें
क्रोध या कलह न करें
भोजन में मांसाहार और मदिरा का सेवन न करें
यम द्वितीया पर यात्रा न करें
भाई को तिलक या भोजन करवाना भूलें नहीं
सूर्यास्त के बाद पूजा या तिलक न करें
स्नान व शुद्धता का पालन करें
सफेद या पीले वस्त्र धारण करें
पूजा से पहले दीप प्रज्वलित करें
यमराज, यमुना और चित्रगुप्त की पूजा करें
बहनें भाई को तिलक लगाएं
पितृ तर्पण और दान करें
दिनभर संयम और सात्त्विकता रखें
दीपदान करें
यमराज का मंत्र जाप करें
यमुना देवी को अर्पण करें दीप और पुष्प
बहन भाई को तिलक के साथ मोली बांधे
गरीबों को भोजन कराएं
घर में दीपक जलाना न भूलें
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