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मणिकर्णिका स्नान

मणिकर्णिका स्नान: क्या है इसका महत्व और इसे कब करना चाहिए? जानें इसके विशेष लाभ और सही पूजा विधि, जिससे आपको मिलेंगे आध्यात्मिक फल!

मणिकर्णिका स्नान के बारे में

विश्व की प्राचीनतम नगरी काशी का मणिकर्णिका घाट सभी घाटों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस घाट पर स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। वहीं, वैकुंठ चतुर्दशी के दिन मणिकर्णिका घाट पर स्नान करने से भगवान भोलेनाथ और भगवान विष्णु दोनों का ही आशीर्वाद प्राप्त होता है।

क्या है मणिकर्णिका स्नान?

  • मणिकर्णिका स्नान कार्तिक मास की वैकुण्ठ चतुर्दशी के दिन काशी के पवित्र मणिकर्णिका घाट पर किया जाने वाला दिव्य अनुष्ठान है।
  • कहा जाता है कि यह स्नान शिव और विष्णु दोनों की कृपा प्राप्त करने का मार्ग है।
  • यह स्नान केवल शरीर की शुद्धि के लिए नहीं, बल्कि आत्मा की पवित्रता और मोक्ष प्राप्ति के लिए किया जाता है।

मणिकर्णिका स्नान कब है?

मणिकर्णिका स्नान कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। इस दिन को वैकुंठ चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। साल 2025 में मणिकर्णिका स्नान 04 नवम्बर 2025, दिन मंगलवार को किया जाएगा। कार्तिक मास में भगवान विष्णु की पूजा करने का विशेष महत्व होता है, और उनको समर्पित मणिकर्णिका स्नान, वैकुंठ चतुर्दशी के दिन रात्रि के तीसरे पहर में करके पुण्यफल प्राप्त किया जाता है।

  • मणिकर्णिका स्नान
  • 04 नवम्बर 2025, मंगलवार
  • कार्तिक, शुक्ल चतुर्दशी

मणिकर्णिका स्नान का शुभ मुहूर्त

मुहूर्त

समय

ब्रह्म मुहूर्त

04:25 ए एम से 05:16 ए एम

प्रातः सन्ध्या

04:50 ए एम से 06:08 ए एम

अभिजित मुहूर्त

11:19 ए एम से 12:04 पी एम

विजय मुहूर्त

01:33 पी एम से 02:17 पी एम

गोधूलि मुहूर्त

05:15 पी एम से 05:41 पी एम

सायाह्न सन्ध्या

05:15 पी एम से 06:32 पी एम

अमृत काल

10:25 ए एम से 11:51 ए एम

निशिता मुहूर्त

11:16 पी एम से 12:07 ए एम, नवम्बर 05

विशेष योग

मुहूर्त

समय

अमृत सिद्धि योग

12:34 पी एम से 06:08 ए एम, नवम्बर 05

सर्वार्थ सिद्धि योग

12:34 पी एम से 06:08 ए एम, नवम्बर 05

रवि योग

06:08 ए एम से 12:34 पी एम

मणिकर्णिका नाम कैसे पड़ा?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब देवी सती अपने पति भगवान शिव का अपमान न सहन करने के कारण अपने पिता दक्ष के यज्ञ कुंड में कूद गई थी, तब भगवान शिव वहां प्रकट हुए और अग्नि में से देवी सती के शरीर को अपने हाथों में उठाए पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे। इसी दौरान माता का कर्णफूल अर्थात कान की बाली इसी स्थान पर गिरी थी और तभी से यह घाट मणिकार्णिका घाट कहा जाने लगा।

सबसे पहले भगवान विष्णु ने कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की वैकुंठ चतुर्दशी को मणिकर्णिका घाट पर स्नान किया था। तभी से यह स्थान पवित्र माना जाता है। वहीं, चौदस के रात्रि में तीसरे पहर के समय इस घाट पर स्नान करने से मोक्ष की प्राप्त होती हैं।

एक समय की बात है, जब भगवान विष्णु पृथ्वी पर भगवान भोलेनाथ की पूजा-आराधना करने के लिए काशी आए थे, तब उन्होंने मणिकर्णिका घाट पर स्नान किया। स्नान के पश्चात भगवान विष्णु, भगवान शिव का पूजन करने के लिए उन पर एक हजार कमल के पुष्प अर्पित करने बैठे। तभी शिव जी ने विष्णु जी की परीक्षा लेने के लिए एक कमल का पुष्प छुपा दिया। भगवान विष्णु को जब वह कमल का पुष्प नहीं दिखा, तो उन्होंने अपने नेत्र भगवान शिव को अर्पित करने की सोची और जैसे ही वह अपना नेत्र शिव जी को चढ़ाने लगे तभी भगवान भोलेनाथ वहां प्रकट हो गए। भोलेनाथ जी ने कहा था, कि पूरे संसार में उनसे बड़ा महादेव का भक्त कोई नहीं है और इस दिन जो भी व्यक्ति मणिकर्णिका घाट पर स्नान कर उनकी पूजा करेगा, उसके सभी कष्ट दूर होंगे तथा मृत्यु के पश्चात उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी।

मणिकार्णिका स्नान का महत्व

मणिकर्णिका घाट पर स्नान करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और इस घाट पर हिंदूओं का दाह संस्कार भी किया जाता है। माना जाता है, कि इस घाट पर अंतिम संस्कार करने से सीधे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इसलिए इस घाट का महत्व अधिक है, और इसे मोक्षदायिनी घाट भी कहा जाता है। इतना ही नहीं, इस घाट को महा शमशान भी कहा जाता है क्योंकि यहां पर चिता की अग्नि कभी बुझती नहीं है और लगातार एक के बाद एक चिताऐं जलती रहती हैं।

घाट पर स्नान न कर पायें तो क्या करें?

मणिकर्णिका घाट पर स्नान करना बड़े सौभाग्य से प्राप्त होता है। लेकिन यदि यह संभव न हो तब आप गंगा जी का मन में ध्यान कर, अपने घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगा जल मिला कर स्नान कर सकते है। ऐसा करने से भी शुभ फल कि प्राप्ति होती है।

मणिकर्णिका स्नान के स्नान के दिन पूजा कैसे करें?

स्नान से पूर्व संकल्प लें

  • “मैं भगवान विष्णु और भगवान शिव की कृपा प्राप्ति के लिए मणिकर्णिका स्नान कर रहा/रही हूँ।”

स्नान करते समय मंत्र जपें

  • “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः”
  • “ॐ नमः शिवाय”

स्नान के बाद दीपदान करें

  • गंगा किनारे दीप प्रवाहित करें और शिवलिंग पर जल अर्पित करें।

पूजा सामग्री

  • तुलसीदल, बेलपत्र, पुष्प, दीपक, धूप, गंगाजल, फल-नैवेद्य।

मणिकर्णिका स्नान के अनुष्ठान

  • रात्रि के तीसरे प्रहर (लगभग 11 PM – 12 AM) में स्नान करने का विशेष महत्व है।
  • स्नान के बाद भगवान विष्णु और शिव की संयुक्त पूजा करें।
  • दान-पुण्य करें — विशेषकर दीपदान और अन्नदान।
  • मंदिरों में जाकर तुलसी, बेलपत्र और पुष्प अर्पित करें।

मणिकर्णिका स्नान पर किये जाने वाले उपाय

  • भगवान शिव को दूध और बेलपत्र अर्पित करें।
  • भगवान विष्णु को तुलसीपत्र और पंचामृत से स्नान कराएँ।
  • दीपदान, अन्नदान और ब्राह्मण भोज करें।
  • गरीबों को वस्त्र और मिठाई बाँटें — यह अत्यंत शुभ माना गया है।
  • घर में गंगा जल छिड़कें और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।

मणिकर्णिका स्नान पूजा अनुष्ठान के लाभ

  • पापों का नाश होता है और मन को शांति मिलती है।
  • जीवन के कष्ट और ग्रहदोष समाप्त होते हैं।
  • पूर्वजों की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • शिव और विष्णु दोनों की कृपा से भक्ति, ज्ञान और धन तीनों की वृद्धि होती है।
  • मृत्यु के उपरांत आत्मा को वैकुण्ठ या शिवलोक की प्राप्ति होती है।
  • मणिकर्णिका स्नान केवल एक धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि आत्मा की मुक्ति का प्रतीक है।
  • काशी का यह घाट शिव और विष्णु दोनों की दिव्य उपस्थिति से पवित्र है।
  • इस वैकुण्ठ चतुर्दशी 2025 पर श्रद्धा और भक्ति से किया गया मणिकर्णिका स्नान जीवन को पवित्र और कर्मों को सफल बना देता है।

मणिकार्णिका इतिहास एवं पौराणिक कथा

मणिकर्णिका घाट का इतिहास बहुत प्राचीन है, जहां पर मां दुर्गा और भोलेनाथ का एक मंदिर भी है। इसका निर्माण मगध के राजा द्वारा किया गया था। यहां पर लगभग 300 से अधिक शवों को प्रतिदिन जलाया जाता है, जो 3000 वर्षों से भी अधिक पहले से होता आ रहा है। इस स्थान पर अंतिम संस्कार का कार्य डोम समुदाय के लोगों द्वारा किया जाता है।

एक समय की बात है, जब राजा हरिश्चंद्र ने अपनी एक प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए अपना घर तथा राजपाट छोड़ दिया था। तब घर छोड़कर उन्हें बहुत प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ा और एक निर्धन की भांति जीवन जीना पड़ा। उसी समय उनके पुत्र की मृत्यु हो गई और वह अपने पुत्र को लेकर मणिकर्णिका घाट पर उसका अंतिम संस्कार करने के लिए पहुंचे। उस समय यह कार्य करवाने के लिए उनके पास दान में देने के पैसे भी नहीं थे। तब उन्होंने अपनी पत्नी की साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर डोम जाति के लोगों को दिया और इस तरह अपने पुत्र का अंतिम संस्कार कराया था।

मणिकर्णिका घाट में फाल्गुन मास की एकादशी के दिन चिता की राख से होली खेलने का विधान भी माना जाता है। ऐसा कहते हैं, कि इस दिन भगवान भोलेनाथ पार्वती जी का गौना करा कर अपने घर वापस लौटे थे। ऐसे में, भगवान की डोली जब यहां से गुजरती है, तो इस घाट के अघोरी बाबा नृत्य कर उनका स्वागत करते हैं।

आज भी यहां अघोरी बाबा चिता की राख तथा गुलाल के साथ होली खेलते हैं और इस प्रकार भगवान भोलेनाथ की पूजा करते हैं। मणिकर्णिका घाट में चैत्र मास की नवरात्रि की अष्टमी तिथि पर यहां वैश्या स्त्रियों द्वारा नृत्य भी किया जाता है। वह स्त्रियां भगवान भोलेनाथ की आराधना करती हैं, और अगले जन्म में उन्हें वैश्या ना बनना पड़े ऐसी भगवान से प्रार्थना करती हैं।

यह थी मणिकार्णिका स्नान की संपूर्ण जानकारी। उम्मीद है यह जानकारी आपको पसंद आई होगी और आपके लिए लाभदायक भी होगी। ऐसे ही पौराणिक तथ्यों के विषय में अवगत होने के लिए बने रहिए श्री मंदिर के साथ।

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Published by Sri Mandir·November 5, 2025

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