होलिका दहन का महत्व और पूजा विधि

होलिका दहन का महत्व और पूजा विधि

जानें क्यों किया जाता है होलिका दहन


फाग होलिका दहन ( Holika Dahan)

होली का नाम सुनते ही मन में रंग-बिरंगे खयाल आते है और खुशियों घर आते दिखाई देती है। होली हिन्दुओं का एक महत्वपूर्ण त्योहार है, फाल्गुन मास की पूर्णिमा की सन्ध्या को होलिका का सांकेतिक रूप से दहन किया जाता है। जिसे छोटी होली भी कहा जाता है।

इस दिन लोग होलिका की पूजा-अर्चना करके उसे अग्नि में भस्म कर देते हैं। जबकि अगले दिन रंगों से खेलने की परंपरा है जिसे धुलंडी के नाम से जाना जाता है। इस दिन पूरे हर्षोल्लास के साथ एक-दूसरे को गुलाल लगाते हुए खुशी से गले मिलते है। होली का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। जिसमेंं होलिका दहन के दिन एक पवित्र अग्नि जलाई जाती है जिसमें सभी तरह की बुराई, अहंकार और नकारात्मकता को जलाया जाता है।

होली के त्योहार की तैयारियां 40 दिन से पहले ही शुरू हो जाती हैं। लोग अपने-अपने घरों में गोबर की गुलरियां या बड़कुल्ले बनाने शुरू कर देते हैं। फिर फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या को इन्हीं गुलरियों से अग्नि जलाई जाती है और मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। उसके बाद अगले दिन सुबह नहाने से पहले इस अग्नि की राख को अपने शरीर पर लगाते हैं, फिर स्नान करते हैं।

होलिका दहन 2024 (Holi 2024 Date)

साल 2024 में होलीका दहन 24 मार्च, रविवार को किया जाएगा। पूर्णिमा तिथि का प्रारम्भ 24 मार्च 2024 को सुबह 09 बजकर 54 मिनट से होगा और पूर्णिमा तिथि का समापन 25 मार्च 2024 को मध्यरात्रि 12 बजकर 29 मिनट पर होगा। वहीं 25 मार्च को पूरे देश में होली खेली जाएगी।

शुभ मुहूर्त होलिका दहन के दिन शुभ मुहूर्त रात 11 बजकर 13 मिनट से मध्यरात्रि 12 बजकर 04 मिनट तक रहेगा। जिसकी कुल अवधि 51 मिनट होगी। वहीँ भद्रा पूँछ शाम 06 बजकर 33 मिनट से शाम 07 बजकर 53 मिनट तक रहेगा और भद्रा मुख शाम 07 बजकर 53 मिनट से रात 10 बजकर 06 मिनट तक होगा।

होलिका दहन का महत्व (Importance Of Holika Dahan )

यदि पौराणिक महत्व की बात करें तो होलिका दहन के पीछे श्री विष्णु के परम भक्त प्रहलाद की कथा अत्यंत प्रचलित है। होलिका दहन भगवान विष्णु के प्रति भक्त प्रहलाद की अगाध आस्था की विजय का उत्सव है।

वैज्ञानिक महत्व

देशभर में लाखों स्थानों पर एक साथ होलिका का दहन किया जाता है। इस दौरान लोग खुद से बनाए गोबर के उपले के साथ ही अन्य पूजा की वस्तुएं इत्यादि भी होलिका की अग्नि में डालते हैं और अग्नि की परिक्रमा करते हैं। जब एक साथ कई सारी होलिका की अग्नि प्रज्वलित की जाती है और उनके साथ गोबर के उपले भी जलते हैं, जिनका धुंआ वातावरण में मौजूद कई जीवाणुओं को नष्ट करने में बहुत सहायक होता है।

सांस्कृतिक महत्व

दोस्तों, होली का महापर्व द्वेष, ईर्ष्या, क्लेश इत्यादि भावनाओं को त्याग कर एक-दूसरे को रंग लगाकर खुशी-खुशी मनाया जाता है। आपसी मनमुटाव को समाप्त करने के लिए होली ही सर्वाधिक उचित त्यौहार है। वास्तव में यह पर्व समाज के सभी वर्गों के लोगों के बीच भाईचारे की भावना को भी शक्ति देता है। इस प्रकार होली धार्मिक के साथ वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण है।

छोटी होली क्या है ( What Is Choti Holi)

होली के एक दिन पहले छोटी होली का त्यौहार मनाया जाता है। छोटी होली का दिन ही होलिका दहन के नाम से भी जाना जाता है। शाम और रात के समय मुहूर्त के अनुसार होलिका का दहन किया जाता है। भगवान विष्णु द्वारा अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए होलिका के वध का दिन ही होलिका दहन का दिन है।

होलिका दहन पूजा विधि (Holika Dahan Pooja Vidhi)

सबसे पहले पूजा की सारी सामग्री एक थाली में रख लें। पूजा थाली के साथ पानी का एक छोटा बर्तन रखें। पूजा स्थल पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठ जाएं। उसके बाद पूजा थाली पर और अपने आप पानी छिड़कें और 'ऊँ पुण्डरीकाक्ष: पुनातु' इस मंत्र का तीन बार जाप करें। अब दाहिने हाथ में जल, चावल, फूल और एक सिक्का लेकर संकल्प लें। फिर दाहिने हाथ में फूल और चावल लेकर गणेश जी का स्मरण करें। भगवान गणेश की पूजा करने के बाद, देवी अंबिका को याद करें और 'ऊँ अम्बिकायै नम: पंचोपचारार्थे गंधाक्षतपुष्पाणि सर्मपयामि' इस मंत्र का जाप करें। मंत्र का जाप करते हुए फूल पर रोली और चावल लगाकर देवी अंबिका को सुगंध सहित अर्पित करें। अब भगवान नरसिंह का स्मरण करें। मंत्र का जाप करते हुए फूल पर रोली और चावल लगाकर भगवान नरसिंह को चढ़ाएं। अब भक्त प्रह्लाद का स्मरण करें। फूल पर रोली और चावल लगाकर भक्त प्रह्लाद को चढ़ाएं। अब होलिका के आगे खड़े हो जाए और हाथ जोड़कर प्रार्थना करें। इसके बाद होलिका में चावल, धूप, फूल, मूंग दाल, हल्दी के टुकड़े, नारियल और सूखे गाय के गोबर से बनी माला जिसे गुलारी और बड़कुला भी कहा जाता है, अर्पित करें। होलिका की परिक्रमा करते हुए उसके चारों ओर कच्चे सूत की तीन, पांच या सात फेरे बांधे जाते हैं। इसके बाद होलिका के ढ़ेर के सामने पानी के बर्तन को खाली कर दें। फिर होलिका दहन किया जाता है। दहन के बाद बड़ों का आशीर्वाद लें और होलिका की परिक्रमा करें। अब होली की आग में नई फसल चढ़ाते और भूनें। उसके बाद भुने हुए अनाज को होलिका प्रसाद के रूप में बांट दिजिए।

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