रक्षा बंधन की कथा

रक्षा बंधन की कथा

भाई-बहन के लिए एक अद्वितीय मौका


रक्षा बंधन की कथा (Rakshabandhan Vrat Katha )

रक्षाबंधन के पर्व पर बहने अपने भाई की कलाई को रेशम की डोर से सजाती हैं और मन ही मन, उनके सुख और कल्याण की कामना करती हैं। हिन्दू धर्म में इस दिन का विशेष महत्व है और इससे जुड़ी काफ़ी कहानियां, आज भी चर्चा का विषय हैं।

आज हम रक्षाबंधन से जुड़ी कुछ पौराणिक कथाओं को विस्तारपूर्वक जानेंगे:

पहली कथा

श्री कृष्ण और द्रौपदी जी से संबंधित ।

रक्षाबंधन के विषय में महाभारत की एक बहुत रोचक कहानी मिलती है, जो द्वाराधीश भगवान श्री कृष्ण और पांडवो की धर्म पत्नी द्रौपदी के विषय में है। धर्मग्रंथों में यह निहित है, कि श्री कृष्ण पांडवों के गुरु समान थे। एक बार, युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के बाद, बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं से भरे दरबार में श्रीकृष्ण की बुआ के बेटे, शिशुपाल ने उनका और भीष्म सहित अन्य कई लोगों का अपमान करना शुरू कर दिया। जब शिशुपाल को लाख बार समझाने के बाद भी वह नहीं रुका, तब श्री कृष्ण ने उसे अपने सुदर्शन चक्र द्वारा मार दिया।

ऐसा करने से उनकी उँगलियों में भी चोट आई और रक्तस्राव होने लगा। जब द्रौपदी ने यह देखा, तो उन्होंने तुरंत ही अपनी साड़ी के एक हिस्से को फाड़कर, उसे श्री कृष्ण की चोट पर बांध दिया। कहा जाता है, कि उनकी करुणा से भावविभोर होकर, श्री कृष्ण ने उनको अपनी बहन का दर्जा दिया और कहा, “यह तुम्हारा मुझ पर ऋण है। तुम जब भी मुझे पुकारोगी, मैं तुम्हारी रक्षा हेतु अवश्य आऊंगा।”

दूसरी कथा

हुमांयू और रानी कर्णावती की कहानी

हुमांयू और रानी कर्णावती की यह रक्षाबंधन से जुड़ी एक सच्ची कहानी है, जो भारतीय इतिहास में दर्ज है। यह उस वक़्त की बात है, जब दिल्ली पर मुगलों का शासन था। उस वक़्त, राजस्थान के चित्तौड़ में राणा सांगा की विधवा, रानी कर्णावती अपना राज्य संभाल रही थीं, क्योंकि उनके पुत्र उस वक़्त आयु में काफ़ी छोटे थे। ऐसे में मौका पाकर गुजरात के शासक, बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। रानी कर्णावती को इस बात का अनुमान था, कि इस युद्ध में मदद हेतु केवल मुगल ही आखिरी उम्मीद हैं।

रानी ने यथाशीघ्र, मुगल बादशाह हुमांयू को राखी के साथ एक संदेश भेजा। जब हुमांयू को वह संदेश रखी के साथ मिला, तो वह अपने सभी काम को दरकिनार करके, अपनी बहन समान रानी कर्णावती की सुरक्षा के लिए निकल पड़ा। हालंकि, उसके चित्तौड़ पहुंचने के पूर्व ही, बहादुर शाह ने चित्तौड़ में प्रवेश कर लिया और अपनी सम्मान की रक्षा के लिए, रानी कर्णावती कई अन्य स्त्रियों के साथ जौहर में कूद गईं। हुमांयू को इस बात का अफ़सोस ज़रूर था, लेकिन उसने रानी के ना होने के बावजूद भी, बहादुर शाह से युद्ध करके चित्तौड़ को अपने क़ब्ज़े में ले लिया और आगे जाकर, उसे रानी के पुत्रों को सौंप दिया।

तीसरी कथा

यम और यमुना जी से जुड़ी

रक्षाबंधन से जुड़ी यह कहानी सबसे प्राचीन है। ऐसी मान्यता है, कि मृत्यु के देवता यम और यमुना भाई-बहन थे और बारह वर्षों तक यम ने, अपनी बहन से मुलाकात नहीं की थी। एक दिन, यमुना बहुत दुखी मन से देवी गंगा के पास गईं और कहा, “मैं अपने भाई यम से मिलना चाहती हूं।” उनके वचन सुनकर, तब देवी गंगा ने यम को उनकी बहन के बारे में याद दिलाया और उनसे अपनी बहन से जाकर मिलने के लिए कहा। यह जानकर यमुना बहुत खुश हुईं और यम के आने पर उन्होंने उनका, यथासंभव सत्कार किया और उनकी कलाई पर राखी भी बांधी।

अपनी बहन से मिलकर और उनका प्रेम पाकर यम अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें भेंट स्वरूप, अमरता प्रदान कर दी। उन्होंने इस बात का भी वचन दिया, कि कोई भी भाई अगर अपनी बहन की रक्षा करता है और उससे राखी बंधवाता है, तो उस पर स्वयं यम की कृपा होगी और वह अमर हो जाएगा। कहा जाता है, कि उस दिन के बाद से ही यह परंपरा शुरू हुई, कि रक्षाबंधन के अवसर पर भाई अपनी बहनों से मिलने जाते हैं और बहनें उनकी लम्बी आयु के लिए, उनकी कलाई पर राखी बांधती हैं।

राखी एक ऐसा पवित्र बंधन और उत्सव है, जो हमें धर्म से भी जोड़ता है और आपसी रिश्तों में प्रेम को भी बढ़ाता है। हम आशा करते हैं, कि रक्षाबंधन से जुड़ी इन कहानियों ने आपको इतिहास और पुराणों की भी छवि दिखाई होगी।

श्री मंदिर द्वारा आयोजित आने वाली पूजाएँ