
इस लेख में आप जानेंगे वंदे मातरम् के लेखक, इसकी रचना का इतिहास, गीत का महत्व और इससे जुड़ी रोचक बातें।
वन्दे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा और देशभक्ति की पहचान है। जानिए इसे किसने लिखा, कब और किन परिस्थितियों में रचा गया, और कैसे यह गीत राष्ट्र के लिए समर्पण की भावना जगाने वाला प्रतीक बन गया।
वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि वह स्वर था जिसने भारतीय राष्ट्रचेतना को पहली बार जागृत किया। यह गीत कुछ शब्दों या पंक्तियों का साधारण गीत नहीं, बल्कि वह गूंज थी जिसने गुलामी के दौर में दबे हुए आत्मसम्मान को आवाज़ दी। इस गीत का इतिहास बेहद दिलचस्प और गौरवपूर्ण है, जिसे जानना आवश्यक है। क्योंकि इसके हर चरण में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, राष्ट्रभावना और सांस्कृतिक चेतना की गहरी झलक मिलती है। इस गीत की रचना ऐसे समय में हुई, जब देश अंग्रेज़ी शासन के अधीन था और भारतीय समाज अपने अस्तित्व, स्वाभिमान और पहचान को लेकर चिंतित और व्यथित था। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इस गीत को केवल एक साहित्यिक रचना के रूप में नहीं, बल्कि मातृभूमि के प्रति प्रेम और जागरूकता जगाने के उद्देश्य से लिखा।
स्वदेशी आंदोलन और राष्ट्रीय प्रतीक
बीसवीं शताब्दी के आरंभ में वंदे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्रीय प्रतीक बन गया। 1905 के बंग-भंग आंदोलन के दौरान यह गीत जन-जन की आवाज़ बनकर उभरा। कोलकाता में वंदे मातरम् संप्रदाय की स्थापना हुई, जहां लोग मातृभूमि को देवी स्वरूप मानकर प्रभात फेरियां निकालते थे। रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महान व्यक्तित्व भी इन आयोजनों में सम्मिलित होते थे। 1906 में बिपिन चंद्र पाल और अरविंदो घोष के संपादन में बंदे मातरम अख़बार शुरू हुआ, जिसने आत्मनिर्भरता, एकता और स्वतंत्रता की भावना को देशभर में फैलाया।
जनआंदोलन, दमन और देशव्यापी गूंज
वंदे मातरम् का नारा उस समय पूरे देश में फैल गया जब बारीसाल में कांग्रेस अधिवेशन के दौरान इसे गाने पर अंग्रेज़ी सेना ने दमन किया। इस घटना के बाद यह गीत बंगाल से निकलकर समूचे भारत में गूंजने लगा। ऐसे में ब्रिटिश सरकार ने स्कूलों और सभाओं में इसके गायन पर रोक लगाने की कोशिश की, परंतु वंदे मातरम् स्वतंत्रता संग्राम की शक्ति और साहस का प्रतीक बन चुका था।
वंदे मातरम् की रचना प्रसिद्ध साहित्यकार और राष्ट्रवादी चिंतक बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह गीत मूल रूप से 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लिखा गया। इस गीत को लिखने की कहानी बहुत रोचक है। जानकारी के अनुसार, जब अंग्रेज़ हुक्मरानों द्वारा गॉड सेव द क्वीन को अनिवार्य रूप से गाए जाने का आदेश दिया गया था। उस समय बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय स्वयं एक सरकारी अधिकारी थे और इस आदेश से उन्हें गहरी ठेस पहुंची। इसी के प्रतिकार और स्वदेशी भावना के प्रतीक के रूप में उन्होंने संस्कृत और बांग्ला के मिश्रण से वंदे मातरम् की रचना की।
इस गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में हैं, जबकि शेष पद बांग्ला भाषा में रचे गए। बाद में यह गीत बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ में सम्मिलित किया गया, जिससे इसकी लोकप्रियता और भी बढ़ गई। राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने इस गीत को स्वरबद्ध किया।
1930 के दशक में गीत के कुछ अंशों को लेकर काफी विवाद उत्पन्न हुआ। अंततः 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि ऐतिहासिक भूमिका के कारण वंदे मातरम् को राष्ट्रगान जन गण मन के समान सम्मान प्राप्त होगा और जोकि आज भी भारतीयों के मन में गर्व, प्रेम और देशभक्ति की भावना को जीवित रखे हुए है।
1. वंदे मातरम् की रचना प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी और यह गीत पहली बार 7 नवंबर 1875 को साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में प्रकाशित हुआ।
2. वर्ष 1882 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इस गीत को अपने कालजयी उपन्यास आनंदमठ में स्थान दिया, जिससे इसे व्यापक पहचान मिली।
3. इस गीत के प्रारंभिक दो पद संस्कृत में रचे गए हैं, जबकि शेष पद बांग्ला भाषा में हैं।
4. इस गीत का अंग्रेज़ी अनुवाद सबसे पहले अरविंदो घोष ने किया।
5. राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने वंदे मातरम् को एक भावपूर्ण और प्रभावशाली संगीतात्मक धुन प्रदान की।
6. दिसंबर 1905 में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में इस गीत को औपचारिक रूप से राष्ट्रगीत का दर्जा प्रदान किया गया।
7. 14 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि संविधान सभा की पहली बैठक का शुभारंभ वंदे मातरम् से हुआ और समापन जन गण मन से किया गया।
8. 15 अगस्त 1947 की प्रातः आकाशवाणी से पंडित ओंकारनाथ ठाकुर द्वारा राग-देश में निबद्ध वंदे मातरम् का ऐतिहासिक सजीव प्रसारण हुआ।
9. 1950 में वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत और जन गण मन को राष्ट्रीय गान का संवैधानिक सम्मान प्रदान किया गया।
10. आज भी वंदे मातरम् को अनेक राष्ट्रीय अवसरों, सांस्कृतिक आयोजनों और आकाशवाणी के प्रसारणों में गौरव, सम्मान और राष्ट्रभावना के प्रतीक के रूप में गाया जाता है।
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