
नवरात्रि की शुरुआत होती है माँ शैलपुत्री की आराधना से। जानें उनकी पावन कथा, जन्म रहस्य और पूजन विधि, जिससे मिलते हैं अपार शक्ति और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद।
नवरात्रि के प्रथम दिन मां दुर्गा के शैलपुत्री रूप की पूजा विशेष महत्व रखती है। इस दिन घटस्थापना और विधिवत पूजा-अर्चन की जाती है, ताकि मां शैलपुत्री की कृपा प्राप्त हो सके। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन मां शैलपुत्री की कथा पढ़ने या सुनने से सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। आइए, जानते हैं मां शैलपुत्री की कथा के बारे में ताकि उनके आशीर्वाद से जीवन सुखमय बने।
मां शैलपुत्री को विभिन्न नामों से जाना जाता है, जिनमें वृषारूढ़ा और देवी सती प्रमुख हैं। इन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है, लेकिन उनका नाम शैलपुत्री कैसे पड़ा, इसके पीछे एक बेहद रोचक और प्रेरणादायक कथा जुड़ी है।
पौरणिक कथाओं के अनुसार, मां शैलपुत्री, देवी दुर्गा का प्रथम स्वरूप मानी जाती हैं। उनका जन्म प्रजापति दक्ष की कन्या सती के रूप में हुआ था। सती का विवाह देवों के देव महादेव से हुआ था, लेकिन सती के पिता दक्ष इस विवाह से अप्रसन्न थे। वे भगवान शिव को तपस्वी, गृहहीन और औघड़ समझते थे और उन्हें योग्य वर नहीं मानते थे। यही कारण था कि वे शिव और सती दोनों से मन ही मन रुष्ट रहते थे। एक बार राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में उन्होंने सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, परंतु जानबूझकर भगवान शिव और सती को निमंत्रण नहीं भेजा। जब सती को इस यज्ञ की जानकारी मिली, तो उन्होंने भोले शंकर से वहां जाने की इच्छा व्यक्त की। भगवान शिव ने बिना निमंत्रण के यज्ञ में जाना अनुचित बताया और उन्हें रोका, लेकिन सती अपने हठ पर अड़ी रहीं।
अंततः महादेव ने उन्हें अनुमति दे दी। सती जब पिता द्वारा आयोजित यज्ञ में पहुँचीं, तो वहाँ न तो किसी ने उनका स्वागत किया, न सम्मान दिया। उल्टा, उनके पति शिव का अपमान किया गया। ऐसा होने पर आहत और क्रोधित सती ने यज्ञ कुंड में स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया। जब भगवान शिव को इस घटना का पता चला, तो वे अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने वीरभद्र को उत्पन्न किया, जिसने यज्ञ को विध्वंस कर दिया और दक्ष का सिर काट दिया। इसके बाद भगवान शिव गहन तप में लीन हो गए। कालांतर में देवी सती ने हिमालयराज की पुत्री के रूप में पुनर्जन्म लिया। जानकारी के अनुसार, मां के इस स्वरूप का दर्शन पाने स्वयं नारायण भी पहुंचे थे। पर्वतराज की पुत्री होने के कारण उन्हें शैलपुत्री के नाम से भी जाना गया। शैल का अर्थ भी पर्वत होता है और इसके अलावा उनका नाम पार्वती, हेमवती भी पड़ा। मां शैलपुत्री का विवाह भोलेनाथ से हुआ था। मां की महिमा औऱ शक्ति दोनों ही अनंत है।
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