
Makar Sankranti Patang के बारे में सबकुछ जानें। यहां पढ़ें पतंग उड़ाने की परंपरा, उत्सव का महत्व और मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने के आसान टिप्स
देश के कई हिस्सों में मकर संक्रांति का पर्व बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है। हालांकि, यह त्योहार विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा हुआ है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस अवसर पर पतंग क्यों उड़ाते है? अगर नहीं तो जानिए पतंग उड़ाने की परंपरा के बारे में।
मकर संक्रांति न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। जैसे ही यह दिन आता है, छतों पर चहल-पहल बढ़ जाती है और आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से सज उठता है। बच्चे हों या बुज़ुर्ग हर कोई इस उत्सव में शामिल होकर खुशी महसूस करता है, लेकिन कैसे शुरू हुई मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा। क्या है इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व, पतंगों के प्रकार और डिज़ाइन से लेकर पतंग से जुड़ी सारी जानकारी के बारे में हम आपको बताएंगे विस्तार से तो पढ़िए।
राम इक दिन चंग उड़ाई। इंद्रलोक में पहुंची जाई॥ तिन सब सुनत तुरंत ही, दीन्ही दोड़ पतंग। खेंच लइ प्रभु बेग ही, खेलत बालक संग॥ यह पंक्तियाँ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित हैं….
जानकारी के अनुसार, मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा भगवान श्री राम के बाल्यकाल से संबंधित मानी जाती है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में भगवान राम द्वारा पतंग उड़ाने का सुंदर वर्णन किया है। मान्यता है कि बाल्यावस्था में एक दिन श्री राम ने पतंग उड़ाई, जो उड़ते-उड़ते इंद्रलोक तक पहुंच गई। उस पतंग की सुंदरता देख इंद्र के पुत्र जयंत की पत्नी मोहित हो गईं और उसे अपने पास रख लिया। पतंग की डोर टूटने पर भगवान राम ने हनुमान जी को उसे खोजकर लाने भेजा। ऐसे में जयंत की पत्नी ने पतंग लौटाने से मना कर दिया और श्री राम के दर्शन के बाद ही पतंग वापस करने की इच्छा जताई। तब प्रभु ने वनवास के समय दर्शन देने का वचन दिया। इस आश्वासन के बाद उन्होंने पतंग वापस लौटा दी। वहीं, तमिल की कंब रामायण (तंदनान रामायण) में भी इस प्रसंग का उल्लेख मिलता है और माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन ही प्रभु श्री राम और केसरी पुत्र हनुमान की मित्रता हुई थी और इसी दिव्य घटना से जुड़कर पतंग उड़ाना आनंद, विश्वास और परंपरा का प्रतीक बन गया। भगवान राम से जुड़ी इस परंपरा को आज भी लोग श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाते हैं। यही कारण है कि मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाना केवल खेल नहीं, बल्कि आस्था और सांस्कृतिक विरासत का उत्सव माना जाता है।
मकर संक्रांति सूर्य देव को समर्पित पर्व है। इस दिन सूर्य उत्तरायण होते हैं, जिसे शुभता, सकारात्मक ऊर्जा और नए आरंभ का प्रतीक माना जाता है। पतंग उड़ाना सूर्य की ओर आस्था प्रकट करने का एक प्रतीकात्मक रूप है। मान्यता है कि आकाश में उड़ती पतंग के माध्यम से सूर्य की किरणें सीधे शरीर तक पहुंचती हैं, जिससे शारीरिक और मानसिक शुद्धि होती है। साथ ही यह बुरी शक्तियों से मुक्ति और जीवन में ऊंचाइयों को छूने की भावना को दर्शाता है।
सूर्य की ऊर्जा से जुड़ाव: खुले आकाश में पतंग उड़ाना सूर्य की किरणों को ग्रहण करने का माध्यम माना जाता है। यह शरीर और मन दोनों के लिए लाभकारी होता है।
सर्दियों में स्वास्थ्य सुरक्षा: इस समय मिलने वाली धूप शरीर को विटामिन-डी प्रदान करती है। इससे हड्डियां मजबूत होती हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसके अलावा पतंग उड़ाने में निरंतर गतिविधि होती है। इससे शरीर चुस्त रहता है और ठंड के मौसम में जकड़न कम होती है।
मन को प्रसन्न रखने का साधन: रंग-बिरंगी पतंगें और उत्सव का माहौल मानसिक तनाव को कम करता है। इससे मन में ताजगी और खुशी बनी रहती है। साथ ही यह परंपरा सामाजिक मेल-जोल को बढ़ावा देती है।
सबसे पहले पतंग को ध्यान से परख लें। उसका काग़ज़, बांस की तीलियाँ और संतुलन सही होना चाहिए। पतंग न ज़्यादा भारी हो और न ही बहुत कमज़ोर, ताकि वह हवा का सही सहारा ले सके।
उड़ाने से पहले डोर की गुणवत्ता ज़रूर जांचें। मज़बूत और लचीली डोर पतंग को बेहतर नियंत्रण देती है और उड़ान के दौरान टूटने की आशंका कम रहती है।
डोर को पतंग से मजबूती से बांधना बहुत ज़रूरी होता है। गांठ ऐसी होनी चाहिए जो हवा के दबाव में भी ढीली न पड़े।
कचरी या चरखी पर डोर को सही तरीके से लपेटें। पतंग उड़ाने के लिए हमेशा खुली जगह और हल्की, स्थिर हवा का चयन करें। हवा की दिशा में खड़े होकर पतंग को धीरे-धीरे ऊपर की ओर छोड़ें।
जैसे ही पतंग हवा पकड़ ले, कचरी की मदद से डोर को संतुलित गति से ढील दें या खींचें। हवा तेज होने पर डोर को ज़्यादा कसने की बजाय थोड़ा ढीला रखें, ताकि पतंग संतुलन बनाए रखे और अचानक नीचे न आए।
उड़ान के दौरान पतंग की हर हरकत पर ध्यान दें। अगर वह डगमगाने लगे तो डोर की लंबाई और खिंचाव को तुरंत समायोजित करें, ताकि पतंग सुरक्षित रूप से आसमान में बनी रहे।
सबसे पहले पतंग उड़ाने वाली डोर का चुनाव हमेशा सावधानीपूर्वक करें। बाज़ार में हाथ कटने वाली डोर और कचरी भी होती हैं। इसलिए उन्हें सही और सुरक्षित तरीके से ही लें।
बहुत तेज़ हवा, छत के किनारे या फिसलन वाली जगहों पर पतंग उड़ाना जोखिम भरा हो सकता है। इसलिए हमेशा सुरक्षित और संतुलित स्थान का चुनाव करें।
डोर की लंबाई और गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देना ज़रूरी है। बहुत ज़्यादा लंबी डोर होने पर वह पेड़ों, बिजली के तारों या आसपास की चीज़ों में उलझ सकती है, जिससे पतंग टूटने के साथ-साथ दुर्घटना की संभावना भी बढ़ जाती है।
पतंग उड़ाने के लिए भीड़-भाड़ से दूर खुली जगह सबसे उपयुक्त मानी जाती है। अधिक लोगों के बीच पतंग उड़ाने से डोर आपस में उलझ सकती है और एक-दूसरे से टकराने का खतरा भी बना रहता है।
डोर पकड़ते समय अचानक तेज़ झटका लग सकता है, जिससे हाथों में चोट या कट लगने की आशंका रहती है। इसलिए सतर्क रहें।
बिजली के खंभों, तारों या ऊंची इमारतों के पास पतंग उड़ाने से बचना चाहिए। इन सभी बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए।
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