वरलक्ष्मी व्रत कब है?
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वरलक्ष्मी व्रत कब है?

क्या आप जानना चाहते हैं कि वरलक्ष्मी व्रत कब है और इसका क्या महत्व है? इस लेख में जानिए माता लक्ष्मी को समर्पित इस व्रत की तिथि, पूजा विधि, व्रत कथा और इस दिन किए जाने वाले विशेष उपायों की पूरी जानकारी।

वरलक्ष्मी व्रत के बारे में

नारायण की पत्नी देवी लक्ष्मी जिनकी पूजा से समृद्धि और सुख-शांति मिलती है, लेकिन क्या आपने वरलक्ष्मी के बारे में सुना है। दरअसल, वरलक्ष्मी भी देवी लक्ष्मी का ही एक रूप हैं। इनका व्रत खासतौर पर दक्षिण भारत में इसे धन-संपत्ति और समृद्धि प्राप्त करने के लिए बड़े श्रद्धा से किया जाता है और क्यों खास है वरलक्ष्मी व्रत आइए जानें इस लेख में।

वरलक्ष्मी व्रत कब है?

वरलक्ष्मी व्रत 28 अगस्त 2026, दिन शुक्रवार को है।

पूजा मुहूर्त (लग्न अनुसार)

  • सिंह लग्न (प्रातः)
  • समय: 05:57 एएम से 07:29 एएम
  • अवधि: 01 घंटा 32 मिनट

वृश्चिक लग्न (अपराह्न)

  • समय: 12:05 पीएम से 02:23 पीएम
  • अवधि: 02 घंटे 19 मिनट

कुम्भ लग्न (संध्या)

  • समय: 06:09 पीएम से 07:37 पीएम
  • अवधि: 01 घंटा 27 मिनट

वृषभ लग्न (मध्यरात्रि)

  • समय: 10:37 पीएम से 12:33 एएम (29 अगस्त)
  • अवधि: 01 घंटा 56 मिनट

वरलक्ष्मी व्रत क्या है?

वरलक्ष्मी व्रत एक विशेष पूजा है जो धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी के एक रूप वरलक्ष्मी की पूजा करने के लिए मनाई जाती है। जानकारी के अनुसार, देवी वरलक्ष्मी का प्रादुर्भाव क्षीर सागर से हुआ था। इस पूजा का उद्देश्य देवी लक्ष्मी से वरदान प्राप्त करना है। जो भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूरा करती हैं। वरलक्ष्मी व्रत श्रावण शुक्ल पक्ष के अंतिम शुक्रवार को मनाया जाता है जो राखी और श्रावण पूर्णिमा से कुछ दिन पहले होता है। यह व्रत विशेष रूप से दक्षिण भारत के राज्यों जैसे आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटका, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में लोकप्रिय है, जहां विवाहित महिलाएं अपने परिवार की सुख-शांति और समृद्धि के लिए इस व्रत को करती हैं, लेकिन यह पुरुषों के लिए भी किया जा सकता है।

वरलक्ष्मी व्रत का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

धार्मिक महत्व: वरलक्ष्मी व्रत का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। क्योंकि यह पूजा देवी लक्ष्मी के आठ स्वरूपों की पूजा करने का अवसर प्रदान करती है, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं में समृद्धि और सफलता का प्रतीक माने जाते हैं।खासकर विवाहित महिलाएं इस व्रत को अपने पति की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति के लिए करती हैं।

सांस्कृतिक महत्व: वरलक्ष्मी व्रत का सांस्कृतिक महत्व भी बहुत अधिक है। यह व्रत महिलाओं को अपनी आध्यात्मिक शक्ति से जुड़ने का एक सशक्त अवसर प्रदान करता है। इस दिन घर को सजाया जाता है और पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। यह व्रत मुख्य रूप से दक्षिण भारत में प्रचलित है, लेकिन अब उत्तर भारत में भी इसे बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।

वरलक्ष्मी व्रत से जुड़ी परंपराएं और मान्यताएं

वरलक्ष्मी व्रत की परंपरा और मान्यता एक पुरानी कथा से जुड़ी हुई है, जिसे भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाया था। यह कथा मगध देश के एक नगर कुंडी की है जोकि सोने से बना हुआ था। इस नगर में एक महिला चारुमती रहती थी जो अपने पति का ध्यान रखती थी। चारुमती हर शुक्रवार को मां लक्ष्मी का व्रत करती थी और देवी लक्ष्मी भी उससे प्रसन्न रहती थीं। एक बार माता लक्ष्मी ने चारुमती को स्वप्न में दर्शन दिए और उसे वरलक्ष्मी व्रत के बारे में बताया। इस व्रत के महत्त्व को समझकर चारुमती ने नगर की अन्य महिलाओं के साथ मिलकर विधिपूर्वक यह व्रत शुरू किया। पूजा के बाद, चारुमती पर देवी लक्ष्मी की विशेष कृपा हुई। उसका घर भी धन-धान्य से भर गया। इस चमत्कारी घटना के बाद, नगर की सभी महिलाएं इस व्रत को करने लगीं।

वरलक्ष्मी व्रत कैसे मनाई जाती है?

व्रत के दिन प्रातः काल उठकर नित्य कर्मों से निपटकर घर के पूजा स्थान की सफाई करें। पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करना चाहिए। पूजा स्थान पर लकड़ी का पटिया रखें और उस पर लाल रंग का साफ वस्त्र बिछाएं। फिर इस पर देवी लक्ष्मी और गणेश जी की मूर्तियों या चित्रों को स्थापित करें।

अब देवी लक्ष्मी और गणेश जी की मूर्तियों या चित्रों पर जल छिड़कर स्नान कराएं। फिर व्रत का संकल्प लें और पूरी श्रद्धा से पूजा प्रारंभ करें। मूर्तियों या तस्वीरों के दाहिनी ओर अक्षत (चावल) की ढेरी के ऊपर जल से भरा कलश रखें। कलश के चारों ओर चंदन लगाएं और उस पर मौली बांधकर कलश की पूजा करें।

अब, माता लक्ष्मी और गणेश जी के समक्ष धूप-दीप और घी का दीपक प्रज्वलित करें। इसके बाद, पूजा में फूल, दूर्वा, नारियल, चंदन, हल्दी, कुमकुम, माला, नैवेद्य (मिष्ठान्न) अर्पित करें। यह पूजा के षोडोषपचार भाग का हिस्सा है। इसके बाद, सोलह श्रृंगार अर्पित करें। श्रृंगार सामग्री के रूप में सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां और नथ धारण कराएं। तत्पश्चात मां को भोग लगाएं, जिसमें विभिन्न प्रकार की मिठाइयां और फल शामिल हों।

पूजा के दौरान देवी लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करें। मंत्र जाप के बाद, वरलक्ष्मी व्रत कथा का पाठ करें। यह कथा सुनने से देवी लक्ष्मी की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। अंत में देवी लक्ष्मी और गणेश जी की आरती करें और क्षमायाचना करें। आरती के बाद श्रप्रसाद का वितरण करें। अदिक जानकारी के लिए किसी विशेषज्ञ या पंडित से जानकारी ले सकते हैं।

वरलक्ष्मी व्रत की तैयारी कैसे की जाती है?

  • पूजा से पहले घर और विशेष रूप से पूजा स्थान की सफाई बहुत महत्वपूर्ण है। घर को पवित्र और साफ-सुथरा रखने से देवी लक्ष्मी का वास होता है। पूजा स्थल को अच्छे से सजाएं और उसे पूरी तरह से पवित्र बनाएं ताकि पूजा का प्रभाव सकारात्मक हो।
  • व्रत के एक दिन पहले ही सभी पूजा सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुएं तैयार कर लें। इस तरह पूजा के दिन किसी भी चीज़ की कमी नहीं रहेगी और पूजा को विधिपूर्वक किया जा सकेगा।
  • पूजा के लिए आवश्यक सभी सामग्री जैसे नारियल, चंदन, हल्दी, कलश, दीपक, धूप, माला, मौली, पत्तियां, फल, फूल, दही, दूध, कपूर आदि पहले से इकट्ठा कर लें। ये सभी सामग्री पूजा की सफलता के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण होती हैं।
  • वरलक्ष्मी व्रत के दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व है। निर्धन लोगों के लिए वस्त्र, श्रृंगार सामग्री और खाने-पीने की वस्तुएं खरीदें।

वरलक्ष्मी व्रत में किए जाने वाले पवित्र कार्य

  • वरलक्ष्मी व्रत के दौरान माता वरलक्ष्मी को 9 प्रकार के फलों और मिठाइयों का भोग अर्पित किया जाता है। इन फलों में आम, केला, नारियल, सेब, नारंगी, पपीता, आमला, आंवला और अन्य मौसमी फल शामिल होते हैं। इसके साथ ही मिठाईयों में लड्डू, पेज, खीर, और अन्य पारंपरिक मिठाइयां अर्पित की जाती हैं।
  • इस दिन विशेष रूप से देवी के 108 नामों का उच्चारण करके पूजा की जाती है। इन नामों का जप करने से मानसिक शांति और आशीर्वाद प्राप्त होता है। पूजा के बाद, आरती करके संतान सुख, घर में समृद्धि और जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता की कामना की जाती है।
  • घर की उत्तर दिशा को लक्ष्मी जी की दिशा माना जाता है। इस दिशा में विशेष रूप से घी का दीपक जलाना शुभ माना जाता है। दीपक के पास “ॐ महालक्ष्म्यै नमः” का 108 बार जाप करें। यह क्रिया घर में लक्ष्मी का वास और समृद्धि की वृद्धि का कारण बनती है।
  • पूजा के दौरान कलश स्थापना की जाती है, जिसमें एक सिक्का डालना बेहद महत्वपूर्ण है। इस सिक्के को चांदी या तांबे का रखा जाता है, क्योंकि यह आर्थिक स्थिरता और धन में वृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
  • कमल का फूल लक्ष्मी जी का प्रिय पुष्प माना जाता है। इस दिन पूजा के दौरान माता को कमल का फूल अर्पित करें।
  • पीला रंग समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है। इस दिन पीले वस्त्र पहनकर पूजा करने से व्रत का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।

वरलक्ष्मी व्रत के दिन किए जाने वाले शुभ कार्य

  • वरलक्ष्मी व्रत के दिन किसी निर्धन स्त्री को श्रृंगार सामग्री दान करना एक अत्यंत पुण्यकारी कार्य माना जाता है। इस कार्य से देवी लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और घर में समृद्धि का वास होता है।
  • लक्ष्मी सहस्रनाम का पाठ वरलक्ष्मी पूजा का एक प्रमुख हिस्सा होता है। अगर समय की कमी हो तो कम से कम "श्री सूक्त" या "लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र" का पाठ करना अत्यंत लाभकारी होता है।
  • इस दिन पूजा के दौरान पीले धागे (मौली) को हल्दी से रंगकर अपने हाथ में बांधना अत्यधिक शुभ माना जाता है। यह धागा देवी लक्ष्मी के रक्षा कवच के रूप में कार्य करता है और भक्त को बुरी शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है।

वरलक्ष्मी व्रत का ज्योतिषीय महत्व

वरलक्ष्मी व्रत का महत्व तब और भी बढ़ जाता है जब किसी के जन्मकुंडली में शुक्र कमजोर हो या धन का योग न बन रहा हो। इस दिन पूजा और दान-पुण्य करने से शुक्र ग्रह की स्थिति सुधरती है और आर्थिक तंगी दूर होती है। साथ ही, यह व्रत घर में धन, संपत्ति और सुख-सुविधाओं में वृद्धि का कारण बनता है। इस दिन पूजा से जीवन में सुख-समृद्धि और आर्थिक सफलता की प्राप्ति होती है, विशेष रूप से उन व्यक्तियों के लिए जिनकी कुंडली में वित्तीय समस्याएँ चल रही हों।

हिंदू धर्म में वरलक्ष्मी व्रत का महत्व

हिंदू धर्म में वरलक्ष्मी व्रत का महत्व खासकर इसलिये है क्योंकि यह व्रत देवी लक्ष्मी के वर रूप को प्रसन्न करता है। कहा जाता है कि देवी लक्ष्मी का यह रूप क्षीर सागर से उत्पन्न हुआ था और उनके इस रूप को सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला माना जाता है। इस व्रत को रखने से धन संबंधी सभी समस्याएं दूर होती हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। यह व्रत विशेष रूप से कठिन उपवास और नियमों के पालन के साथ किया जाता है। वरलक्ष्मी व्रत के फलस्वरूप न केवल धन और समृद्धि मिलती है, बल्कि यह व्रत मान-सम्मान और प्रतिष्ठा में भी वृद्धि करता है।

वरलक्ष्मी व्रत का आध्यात्मिक महत्व

वरलक्ष्मी व्रत का आध्यात्मिक महत्व भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह व्रत भक्तों को आत्मिक शांति और आंतरिक संतुलन की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है। इस व्रत के माध्यम से महिलाएं न केवल बाहरी समृद्धि की कामना करती हैं, बल्कि अपने भीतर की आध्यात्मिक शक्ति को भी जागृत करती हैं। पूजा के दौरान ध्यान और प्रार्थना का विशेष ध्यान रखा जाता है, जिससे मन और आत्मा को शांति मिलती है। यह व्रत जीवन में संतुलन और मानसिक शांति की प्राप्ति के लिए एक साधना के रूप में कार्य करता है। इसके द्वारा भक्त देवी लक्ष्मी की कृपा से अपने जीवन के सभी क्षेत्रो में आध्यात्मिक उन्नति की कामना करते हैं।

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Published by Sri Mandir·June 15, 2026

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