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रांधण छठ कब है?

क्या आप जानना चाहते हैं कि रांधण छठ कब मनाई जाती है और इसका क्या महत्व है? इस लेख में जानिए रांधण छठ की तिथि, धार्मिक महत्व, परंपराएं, पूजा विधि और इस दिन बनाए जाने वाले विशेष व्यंजनों से जुड़ी पूरी जानकारी।

रांधण छठ के बारे में

रांधण छठ गुजरात की संस्कृति और परंपरा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह पर्व माता शीतला को समर्पित होता है और श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। इसके अगले दिन शीतला सातम का पर्व आता है, जिसे विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि माता शीतला की आराधना करने से घर-परिवार को रोगों और मौसमी बीमारियों से रक्षा मिलती है।

रांधण छठ कब है?

वर्ष 2026 में रांधण छठ का पर्व बुधवार, 2 सितम्बर 2026 को मनाया जाएगा। इसके अगले दिन गुरुवार, 3 सितम्बर 2026 को शीतला सातम मनाई जाएगी।

  • षष्ठी तिथि प्रारंभ - 2 सितम्बर 2026, सुबह 06:12 बजे से
  • षष्ठी तिथि समाप्त - 3 सितम्बर 2026, सुबह 04:25 बजे तक

रांधण छठ क्या है?

रांधण छठ एक पारंपरिक और धार्मिक पर्व है, जिसे विशेष रूप से गुजरात में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व भाद्रपद अथवा श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को आता है और माता शीतला की पूजा से जुड़ा माना जाता है। कई स्थानों पर इसे बलराम जयंती, हलछठ या हरछठ के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का जन्म हुआ था। इसलिए महिलाएं अपने बच्चों की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए व्रत और पूजा करती हैं।

“रांधण छठ” का अर्थ होता है - छठ के दिन भोजन बनाना। इस दिन परिवारों में अगले दिन यानी शीतला सातम के लिए विभिन्न प्रकार के पकवान तैयार किए जाते हैं, क्योंकि शीतला सातम पर चूल्हा जलाना शुभ नहीं माना जाता। उस दिन पहले से बना हुआ ठंडा भोजन ग्रहण करने की परंपरा है। मान्यता है कि माता शीतला की आराधना करने और इस परंपरा का पालन करने से परिवार को रोगों, विशेषकर मौसम बदलने से होने वाली बीमारियों और नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा मिलती है।

रांधण छठ का महत्व

यह दिन मातृत्व, संरक्षण और परिवार की सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। विशेष रूप से महिलाएं अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य, लंबी आयु और खुशहाल जीवन की कामना के साथ इस पर्व को श्रद्धा से मनाती हैं। इस पर्व का संबंध भगवान बलराम जी से भी माना जाता है, जिन्हें कृषि, मेहनत और अन्नदाता का प्रतीक माना जाता है। इसलिए रांधण छठ ग्रामीण जीवन और खेती-बाड़ी की परंपराओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। रांधण छठ का एक विशेष महत्व रसोई और भोजन की परंपरा से भी जुड़ा है। परंपरा के अनुसार, इस दिन ठंडा और पहले से बना भोजन ही ग्रहण किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि माता शीतला को ठंडा भोजन अर्पित करने और नियमों का पालन करने से परिवार को रोगों और नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा मिलती है। साथ ही यह पर्व स्वच्छता, अनुशासन और पारंपरिक जीवनशैली का संदेश भी देता है।

रांधण छठ का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

रांधण छठ का पर्व धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह दिन माता शीतला और भगवान बलराम जी की आराधना से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमों के साथ पूजा करने से परिवार में सुख, शांति और आरोग्य बना रहता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रांधण छठ के दिन तैयार किया गया भोजन अगले दिन शीतला सातम पर माता शीतला को अर्पित किया जाता है। शीतला सातम के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता, जिससे शीतलता, पवित्रता और संयम का संदेश मिलता है। यह परंपरा व्यक्ति को अनुशासन और सादगी का महत्व भी सिखाती है। इस पर्व का संबंध भगवान बलराम जी से भी माना जाता है, जिन्हें शक्ति, परिश्रम और कृषि का प्रतीक माना जाता है। इसलिए यह दिन प्रकृति, अन्न और मेहनत के प्रति सम्मान प्रकट करने का अवसर भी माना जाता है।

आध्यात्मिक रूप से रांधण छठ मन को शांत और सकारात्मक बनाने वाला पर्व माना गया है। इस दिन महिलाएं व्रत और पूजा करके अपने बच्चों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखमय जीवन की कामना करती हैं। श्रद्धा, सेवा और परिवार के प्रति समर्पण की भावना इस पर्व को और भी विशेष बनाती है।

रांधण छठ से जुड़ी परंपराएं और मान्यताएं

  • रांधण छठ के साथ कई पारंपरिक, सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी मान्यताएं भी जुड़ी हुई हैं। यह पर्व लोगों को स्वच्छता, सादगी और पारिवारिक मूल्यों का महत्व समझाता है।
  • रांधण छठ के दिन अगले दिन यानी शीतला सातम के लिए सभी भोजन और पकवान पहले से तैयार किए जाते हैं। मान्यता है कि शीतला सातम के दिन रसोई में आग नहीं जलानी चाहिए।
  • इस पर्व पर माता शीतला की श्रद्धा से पूजा की जाती है और उन्हें ठंडा भोजन अर्पित किया जाता है। माना जाता है कि इससे परिवार रोगों से सुरक्षित रहता है।
  • खासकर मौसम बदलने के समय स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने का संदेश मिलता है। ठंडा भोजन ग्रहण करना मन और जीवन में शीतलता, धैर्य और सरलता बनाए रखने का संदेश देता है।
  • शीतला सातम के दिन भोजन न पकाने की परंपरा महिलाओं को रसोई के कार्यों से एक दिन का आराम देने का प्रतीक भी मानी जाती है।
  • इस अवसर पर कई पारंपरिक और पौष्टिक पकवान बनाए जाते हैं, जिससे पुरानी खान-पान संस्कृति अगली पीढ़ियों तक पहुंचती है।
  • रांधण छठ के दौरान परिवार के सदस्य मिलकर भोजन तैयार करते हैं और पूजा-पाठ में भाग लेते हैं, जिससे पारिवारिक प्रेम बढ़ता है। महिलाएं अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य, सुख और लंबी आयु के लिए व्रत और पूजा करती हैं।
  • इस दिन नियम, संयम और सात्विकता का पालन करना शुभ माना जाता है, जिससे मन में सकारात्मकता बनी रहती है। रांधण छठ की परंपराएं लोगों को अपनी संस्कृति, रीति-रिवाजों और धार्मिक मान्यताओं से जोड़े रखती हैं।

रांधण छठ की तैयारी कैसे की जाती है?

घर और रसोई की सफाई - रांधण छठ से पहले घर, विशेषकर रसोईघर की अच्छी तरह सफाई की जाती है। इसे पवित्र और स्वच्छ रखना शुभ माना जाता है।

विभिन्न पकवान तैयार करना - इस दिन अगले दिन के लिए कई प्रकार के पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं, जैसे पूड़ी, थेपला, रोटला, दाल, चावल, सब्जियां, मिठाइयां और अन्य पकवान।

भोजन को सुरक्षित रखना - तैयार किए गए भोजन को ठंडा होने के बाद साफ बर्तनों में सुरक्षित रखा जाता है, क्योंकि शीतला सातम के दिन नया भोजन नहीं बनाया जाता।

चूल्हे और रसोई की पूजा - कई घरों में गैस चूल्हे या पारंपरिक चूल्हे को साफ कर उसकी पूजा की जाती है। कुछ लोग चूल्हे पर पानी छिड़ककर उसे ठंडा करते हैं, जो अगले दिन चूल्हा न जलाने का प्रतीक माना जाता है।

पूजा सामग्री की तैयारी - पूजा के लिए हल्दी, कुमकुम, अक्षत, फूल, रोली, जल और ठंडे पकवान पहले से तैयार रखे जाते हैं।

रांधण छठ कैसे मनाई जाती है?

  • इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान किया जाता है और स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं।
  • घर या मंदिर में माता शीतला की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है।
  • माता शीतला को एक दिन पहले तैयार किए गए ठंडे भोजन का भोग लगाया जाता है। इसमें दही-भात, मिठाई, पूड़ी और अन्य पकवान शामिल होते हैं।
  • माता को जल, फूल, हल्दी, रोली और अक्षत अर्पित किए जाते हैं तथा श्रद्धा से प्रार्थना की जाती है।
  • इस दिन शीतला माता चालीसा या स्तोत्र का पाठ करना शुभ माना जाता है।
  • पूजा के बाद बचा हुआ जल घर और परिवार के सदस्यों पर छिड़का जाता है। मान्यता है कि इससे रोगों और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा होती है।
  • पूरे दिन केवल पहले से बना हुआ ठंडा भोजन ही खाया जाता है और चूल्हा नहीं जलाया जाता।
  • इस पर्व को शांत, सात्विक और श्रद्धा पूर्ण वातावरण में मनाया जाता है, जिससे परिवार में सुख और शांति बनी रहे।

रांधण छठ मनाने के लाभ

  • मान्यता है कि रांधण छठ और शीतला माता की पूजा करने से परिवार को रोगों और मौसमी बीमारियों से सुरक्षा मिलती है।
  • महिलाएं इस दिन अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य, सुख और दीर्घायु के लिए व्रत और पूजा करती हैं।
  • श्रद्धा और नियमों के साथ यह पर्व मनाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा, शांति और पारिवारिक प्रेम बढ़ता है।
  • धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता शीतला की पूजा करने से जीवन की परेशानियां कम होती हैं और परिवार सुरक्षित रहता है।
  • इस अवसर पर पूरा परिवार मिलकर भोजन तैयार करता है और पूजा में भाग लेता है, जिससे आपसी प्रेम और संबंध मजबूत होते हैं।
  • इस दिन सादगी और सात्विकता का पालन किया जाता है, जिससे शरीर और मन दोनों को लाभ मिलता है।
  • रांधण छठ लोगों को अपनी संस्कृति, रीति-रिवाजों और धार्मिक मान्यताओं से जोड़े रखती है।

रांधण छठ का संदेश

रांधण छठ का पर्व हमें स्वच्छता, सादगी, श्रद्धा और परिवार के महत्व का सुंदर संदेश देता है। यह त्योहार सिखाता है कि जीवन में स्वास्थ्य, अनुशासन और सकारात्मक सोच कितनी आवश्यक है। यह पर्व हमें माता-पिता, परिवार और बच्चों के प्रति प्रेम व जिम्मेदारी निभाने की प्रेरणा देता है। रांधण छठ का संदेश है कि हमें अपने जीवन में शांति, संयम और सात्विकता बनाए रखनी चाहिए। यह पर्व परिवार को साथ जोड़ने, संस्कृति को आगे बढ़ाने और भगवान के प्रति आस्था मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है।

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Published by Sri Mandir·August 31, 2026

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