
क्या आप जानना चाहते हैं कि वरलक्ष्मी व्रत कब है और इसका क्या महत्व है? इस लेख में जानिए माता लक्ष्मी को समर्पित इस व्रत की तिथि, पूजा विधि, व्रत कथा और इस दिन किए जाने वाले विशेष उपायों की पूरी जानकारी।
नारायण की पत्नी देवी लक्ष्मी जिनकी पूजा से समृद्धि और सुख-शांति मिलती है, लेकिन क्या आपने वरलक्ष्मी के बारे में सुना है। दरअसल, वरलक्ष्मी भी देवी लक्ष्मी का ही एक रूप हैं। इनका व्रत खासतौर पर दक्षिण भारत में इसे धन-संपत्ति और समृद्धि प्राप्त करने के लिए बड़े श्रद्धा से किया जाता है और क्यों खास है वरलक्ष्मी व्रत आइए जानें इस लेख में।
वरलक्ष्मी व्रत 28 अगस्त 2026, दिन शुक्रवार को है।
पूजा मुहूर्त (लग्न अनुसार)
वृश्चिक लग्न (अपराह्न)
कुम्भ लग्न (संध्या)
वृषभ लग्न (मध्यरात्रि)
वरलक्ष्मी व्रत एक विशेष पूजा है जो धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी के एक रूप वरलक्ष्मी की पूजा करने के लिए मनाई जाती है। जानकारी के अनुसार, देवी वरलक्ष्मी का प्रादुर्भाव क्षीर सागर से हुआ था। इस पूजा का उद्देश्य देवी लक्ष्मी से वरदान प्राप्त करना है। जो भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूरा करती हैं। वरलक्ष्मी व्रत श्रावण शुक्ल पक्ष के अंतिम शुक्रवार को मनाया जाता है जो राखी और श्रावण पूर्णिमा से कुछ दिन पहले होता है। यह व्रत विशेष रूप से दक्षिण भारत के राज्यों जैसे आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटका, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में लोकप्रिय है, जहां विवाहित महिलाएं अपने परिवार की सुख-शांति और समृद्धि के लिए इस व्रत को करती हैं, लेकिन यह पुरुषों के लिए भी किया जा सकता है।
धार्मिक महत्व: वरलक्ष्मी व्रत का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। क्योंकि यह पूजा देवी लक्ष्मी के आठ स्वरूपों की पूजा करने का अवसर प्रदान करती है, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं में समृद्धि और सफलता का प्रतीक माने जाते हैं।खासकर विवाहित महिलाएं इस व्रत को अपने पति की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति के लिए करती हैं।
सांस्कृतिक महत्व: वरलक्ष्मी व्रत का सांस्कृतिक महत्व भी बहुत अधिक है। यह व्रत महिलाओं को अपनी आध्यात्मिक शक्ति से जुड़ने का एक सशक्त अवसर प्रदान करता है। इस दिन घर को सजाया जाता है और पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। यह व्रत मुख्य रूप से दक्षिण भारत में प्रचलित है, लेकिन अब उत्तर भारत में भी इसे बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
वरलक्ष्मी व्रत की परंपरा और मान्यता एक पुरानी कथा से जुड़ी हुई है, जिसे भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाया था। यह कथा मगध देश के एक नगर कुंडी की है जोकि सोने से बना हुआ था। इस नगर में एक महिला चारुमती रहती थी जो अपने पति का ध्यान रखती थी। चारुमती हर शुक्रवार को मां लक्ष्मी का व्रत करती थी और देवी लक्ष्मी भी उससे प्रसन्न रहती थीं। एक बार माता लक्ष्मी ने चारुमती को स्वप्न में दर्शन दिए और उसे वरलक्ष्मी व्रत के बारे में बताया। इस व्रत के महत्त्व को समझकर चारुमती ने नगर की अन्य महिलाओं के साथ मिलकर विधिपूर्वक यह व्रत शुरू किया। पूजा के बाद, चारुमती पर देवी लक्ष्मी की विशेष कृपा हुई। उसका घर भी धन-धान्य से भर गया। इस चमत्कारी घटना के बाद, नगर की सभी महिलाएं इस व्रत को करने लगीं।
व्रत के दिन प्रातः काल उठकर नित्य कर्मों से निपटकर घर के पूजा स्थान की सफाई करें। पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करना चाहिए। पूजा स्थान पर लकड़ी का पटिया रखें और उस पर लाल रंग का साफ वस्त्र बिछाएं। फिर इस पर देवी लक्ष्मी और गणेश जी की मूर्तियों या चित्रों को स्थापित करें।
अब देवी लक्ष्मी और गणेश जी की मूर्तियों या चित्रों पर जल छिड़कर स्नान कराएं। फिर व्रत का संकल्प लें और पूरी श्रद्धा से पूजा प्रारंभ करें। मूर्तियों या तस्वीरों के दाहिनी ओर अक्षत (चावल) की ढेरी के ऊपर जल से भरा कलश रखें। कलश के चारों ओर चंदन लगाएं और उस पर मौली बांधकर कलश की पूजा करें।
अब, माता लक्ष्मी और गणेश जी के समक्ष धूप-दीप और घी का दीपक प्रज्वलित करें। इसके बाद, पूजा में फूल, दूर्वा, नारियल, चंदन, हल्दी, कुमकुम, माला, नैवेद्य (मिष्ठान्न) अर्पित करें। यह पूजा के षोडोषपचार भाग का हिस्सा है। इसके बाद, सोलह श्रृंगार अर्पित करें। श्रृंगार सामग्री के रूप में सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां और नथ धारण कराएं। तत्पश्चात मां को भोग लगाएं, जिसमें विभिन्न प्रकार की मिठाइयां और फल शामिल हों।
पूजा के दौरान देवी लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करें। मंत्र जाप के बाद, वरलक्ष्मी व्रत कथा का पाठ करें। यह कथा सुनने से देवी लक्ष्मी की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। अंत में देवी लक्ष्मी और गणेश जी की आरती करें और क्षमायाचना करें। आरती के बाद श्रप्रसाद का वितरण करें। अदिक जानकारी के लिए किसी विशेषज्ञ या पंडित से जानकारी ले सकते हैं।
वरलक्ष्मी व्रत का महत्व तब और भी बढ़ जाता है जब किसी के जन्मकुंडली में शुक्र कमजोर हो या धन का योग न बन रहा हो। इस दिन पूजा और दान-पुण्य करने से शुक्र ग्रह की स्थिति सुधरती है और आर्थिक तंगी दूर होती है। साथ ही, यह व्रत घर में धन, संपत्ति और सुख-सुविधाओं में वृद्धि का कारण बनता है। इस दिन पूजा से जीवन में सुख-समृद्धि और आर्थिक सफलता की प्राप्ति होती है, विशेष रूप से उन व्यक्तियों के लिए जिनकी कुंडली में वित्तीय समस्याएँ चल रही हों।
हिंदू धर्म में वरलक्ष्मी व्रत का महत्व खासकर इसलिये है क्योंकि यह व्रत देवी लक्ष्मी के वर रूप को प्रसन्न करता है। कहा जाता है कि देवी लक्ष्मी का यह रूप क्षीर सागर से उत्पन्न हुआ था और उनके इस रूप को सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला माना जाता है। इस व्रत को रखने से धन संबंधी सभी समस्याएं दूर होती हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। यह व्रत विशेष रूप से कठिन उपवास और नियमों के पालन के साथ किया जाता है। वरलक्ष्मी व्रत के फलस्वरूप न केवल धन और समृद्धि मिलती है, बल्कि यह व्रत मान-सम्मान और प्रतिष्ठा में भी वृद्धि करता है।
वरलक्ष्मी व्रत का आध्यात्मिक महत्व भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह व्रत भक्तों को आत्मिक शांति और आंतरिक संतुलन की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है। इस व्रत के माध्यम से महिलाएं न केवल बाहरी समृद्धि की कामना करती हैं, बल्कि अपने भीतर की आध्यात्मिक शक्ति को भी जागृत करती हैं। पूजा के दौरान ध्यान और प्रार्थना का विशेष ध्यान रखा जाता है, जिससे मन और आत्मा को शांति मिलती है। यह व्रत जीवन में संतुलन और मानसिक शांति की प्राप्ति के लिए एक साधना के रूप में कार्य करता है। इसके द्वारा भक्त देवी लक्ष्मी की कृपा से अपने जीवन के सभी क्षेत्रो में आध्यात्मिक उन्नति की कामना करते हैं।
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