सनातन धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व है। यह समय पूर्वजों की आत्माओं की शांति के लिए किए जाने वाले सभी अनुष्ठानों के लिए सबसे शुभ माना गया है। पितृ पक्ष के दौरान पड़ने वाली सभी तिथियों का अपना अलग विशेष महत्व है, जिसमें से एक है त्रयोदशी तिथि। इसे श्राद्ध त्रयोदशी भी कहते हैं। इस तिथि पर उन पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं, जिनकी मृत्यु हिंदु कलैंडर के अनुसार, किसी भी मास की त्रयोदशी तिथि पर हुई हो। पितृ पक्ष का समय पितृ दोष के निवारण के लिए भी शुभ माना जाता है। हिंदु धर्म ग्रंथों के अनुसार 'पितृ दोष' पूर्वजों की अधूरी इच्छाओं और नकारात्मक कर्मों के कारण होता है। इस दोष से पीड़ित जातक के जीवन में आर्थिक परेशानियां, रिश्तों में तनाव एवं विवाद और स्वास्थ्य संबधी समस्याओं का सिलसिला लगा ही रहता है। माना जाता है कि पितृ पक्ष के दौरान पितृ दोष शांति महापूजा करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।
यदि यह पूजा किसी तीर्थ स्थल पर की जाए तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। ऐसे में तीर्थ स्थलों का राजा कहे जाने वाले शहर प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती जैसी नदियों का संगम है, अर्थात तीनों पवित्र नदियां इस स्थान पर आकर मिलती है। हिंदु धर्म में त्रिवेणी संगम का विशेष महत्व है। पदम पुराण के अनुसार, जो भी व्यक्ति त्रिवेणी संगम पर पितरों के लिए पूजा करता है, उसके पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही माना जाता है कि त्रिवेणी संगम जैसे पवित्र स्थल पर संध्याकाल में मां गंगा की आरती करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। इसलिए पितृ पक्ष की श्राद्ध त्रयोदशी तिथि के शुभ अवसर पर प्रयागराज के त्रिवेणी संगम में पितृ दोष शांति महापूजा एवं संध्याकालीन गंगा आरती का आयोजन किया जा रहा है। श्री मंदिर के माध्यम से इस पूजा में भाग लें और अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और परिवारिक क्लेश से मुक्ति का आशीष प्राप्त करें। इसके अलावा, पितृपक्ष में पूर्वजों के लिए दान पुण्य करने का भी विधान है। मान्यता है कि इस समय दान करने से दोगुने फल की प्राप्ति होती है, जिनमें पितृ पक्ष विशेष पंच भोग, दीप दान भी शामिल है। इसलिए इस पूजा के साथ अतिरिक्त विकल्प के रूप में दिए गए जैसे पंच भोग, दीप दान एवं गंगा आरती का चुनाव करना आपके लिए फलदायी हो सकता है। इसलिए इस पूजा में इन विकल्पों को चुनकर अपनी पूजा को और भी अधिक प्रभावशाली बनाएं।