✨ मौनी अमावस्या सनातन परंपरा में आत्मचिंतन, मौन और भीतर की शुद्धि से जुड़ा अत्यंत विशेष दिन माना जाता है। इस दिन व्यक्ति बाहरी शोर से हटकर अपने विचारों, भावनाओं और पूर्वजों से जुड़े संस्कारों पर ध्यान करता है। इसी कारण मौनी अमावस्या को पितृ कर्मों के लिए भी महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि यह दिन मन को शांत करके श्रद्धा के साथ अर्पण करने का अवसर देता है।
✨ इस पावन तिथि पर प्रयागराज स्थित त्रिवेणी संगम का महत्व और अधिक गहरा हो जाता है। गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम सदियों से आत्मिक शुद्धि और संतुलन का प्रतीक माना गया है। मान्यताओं के अनुसार, मौनी अमावस्या के दिन संगम तट पर किया गया पितृ तर्पण और अर्पण श्रद्धा के भाव से जुड़ता है और पितरों की आत्मा की शांति की कामना का माध्यम बनता है।
✨ मौनी अमावस्या माघ मास के दौरान आती है, जब प्रयाग क्षेत्र में माघ मेला भी आयोजित होता है। माघ मास को साधना और पुण्य का काल माना गया है। इस समय संगम का वातावरण संयम, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा रहता है, जो पितृ शांति से जुड़े कर्मों को भावनात्मक रूप से अधिक गहराई प्रदान करता है। हालांकि माघ मेला इस दिन की पृष्ठभूमि बनता है, लेकिन साधना का मुख्य केंद्र मौनी अमावस्या की शांत और गंभीर ऊर्जा ही रहती है।
✨ ऐसा माना जाता है कि कभी-कभी पूर्वजों से जुड़े अधूरे भाव या कर्म वर्तमान जीवन में मानसिक बेचैनी, पारिवारिक असंतुलन या जीवन में रुकावट के रूप में महसूस हो सकते हैं। ऐसे में मौनी अमावस्या पर की जाने वाली पितृ शांति पूजा व्यक्ति को अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने और भीतर के भावनात्मक बोझ को समझने का अवसर देती है। यह पूजा समाधान का दावा नहीं करती, बल्कि संतुलन और शांति की दिशा में एक आध्यात्मिक प्रयास मानी जाती है।
✨ त्रिवेणी संगम पर मौनी अमावस्या के दिन संपन्न होने वाली इस विशेष पूजा में विधिवत पितृ तर्पण, अर्पण और आरती की जाती है। ऐसा माना जाता है कि संगम की शांत और पवित्र धारा इस साधना को भावनात्मक रूप से गहरा बनाती है और परिवार में शांति व सकारात्मकता के भाव को मजबूत करती है।
✨ श्री मंदिर के माध्यम से त्रिवेणी संगम पर आयोजित इस मौनी अमावस्या पूजा में सहभागी बनकर आप भी इस पावन वातावरण से जुड़ सकते हैं और अपने पितरों की शांति तथा परिवार के लिए श्रद्धा के साथ कामना कर सकते हैं।