सनातन धर्म में नवरात्रि का विशेष महत्व होता है, क्योंकि नवरात्रि के इन नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। इस दौरान सप्तमी तिथि मां दुर्गा के सातवें स्वरूप यानि माँ कालरात्रि को समर्पित है। ज्योतिषियों के अनुसार, देवी कालरात्रि शनि ग्रह को नियंत्रित करती हैं अर्थात इनको समर्पित सप्तमी तिथि पर शनिदेव की पूजा से शनि के दुष्प्रभाव दूर होते हैं। इतना ही नहीं माता की कृपा से ग्रह-बाधाएं भी दूर होती हैं। वहीं मां कालरात्रि का शनिदेव से भी संबंध है। जहां मां कालरात्रि का रंग श्याम वहीं शनिदेव का रंग भी श्याम है। शनिदेव को ज्योतिष शास्त्र में न्याय का देवता माना गया है तो मां कालरात्रि भी गलत कार्यों को करने वालों को दंडित करती हैं। ज्योतिषियों की मानें तो शनि उन शक्तिशाली ग्रहों में से एक हैं, जिनकी चाल और स्थितियां मनुष्य को सबसे अधिक प्रभावित कर सकती हैं। जिन लोगों पर शनिदेव की कृपा होती है उन्हें जीवन में समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता है।
वहीं जब कुंडली में शनि शुभ स्थिति में होते हैं तो व्यक्ति को हर कार्य में सफलता मिलती है। यदि शनि अशुभ स्थिति में हो तो बने बनाए काम भी बिगड़ने लगते हैं और जीवन में अनचाही बाधाएं भी आने लगती हैं। पुराणों में शनिदेव को प्रसन्न करने के वैसे तो कई उपाय बताए गए हैं लेकिन उनमें मंत्रों के जाप का विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए शनि देव के मूल मंत्र का जाप करने के साथ हवन करने से जीवन के सभी प्रकार के कष्ट कम हो जाते हैं। यह काम में रुकावट एवं बाधाओं से मुक्त करने में भी मददगार सिद्ध होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शनि की महादशा 19 वर्ष तक चलती है इसलिए इस दशा में मूल मंत्र का 19,000 बार जाप करना अत्यंत लाभकारी माना गया है। यही कारण है कि कालरात्रि को समर्पित सप्तमी तिथि पर उज्जैन के श्री नवग्रह शनि मंदिर में 19,000 शनि मूल मंत्र जाप और शनि तिल तेल अभिषेक का आयोजन किया जा रहा है, श्री मंदिर के माध्यम से इसमें भाग लें और जीवन में समस्याओं से मुक्ति और मानसिक स्पष्टता का आशीष पाएं।