🕉️ कई भक्तों के जीवन में ऐसे हालात आते हैं जब रिश्ते, पारिवारिक शांति या विवाह जैसे महत्वपूर्ण निर्णय बिना किसी स्पष्ट कारण के अटके रहते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, इसका एक कारण कालसर्प दोष माना जाता है। यह दोष तब बनता है जब जन्मकुंडली के सातों ग्रह राहु और केतु के बीच स्थित हो जाते हैं। राहु पिछले जन्मों की अधूरी इच्छाओं और कर्मों का प्रतीक है, जबकि केतु वैराग्य और कर्म ऋण को दर्शाता है। जब इनका प्रभाव अधिक हो जाता है, तो विवाह में देरी, मानसिक अशांति और जीवन में बार-बार रुकावटें आने लगती हैं। ऐसे समय में भगवान श्री शिव की शरण लेना शुभ माना जाता है, क्योंकि वे ग्रह ऊर्जाओं का संतुलन स्थापित करते हैं।
🕉️ शास्त्रों के अनुसार भगवान श्री शिव आदिगुरु हैं, जो कर्म शुद्धि और परिवर्तन के स्वामी हैं। राहु और केतु भी उनकी कृपा से संतुलित होते हैं। त्र्यंबकेश्वर तीर्थ क्षेत्र, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है, कालसर्प दोष शांति के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। माना जाता है कि यहां सच्चे मन से की गई पूजा से पुराने कर्म दोष शांत होते हैं और जीवन में नई स्पष्टता आती है।
🕉️ इस पूजा का महत्व तब और बढ़ जाता है जब इसे राहु-शासित शतभिषा नक्षत्र में किया जाता है। यह नक्षत्र छिपे हुए कर्मों, अकेलेपन और जीवन में होने वाली देरी से जुड़ा होता है। शतभिषा नक्षत्र में कालसर्प दोष शांति पूजा करने से राहु के मूल प्रभाव को शांत करने में सहायता मिलती है। मंत्र, पूजन और संकल्प के माध्यम से विवाह, रिश्तों और मानसिक शांति से जुड़ी बाधाओं के निवारण की प्रार्थना की जाती है।
🙏 श्री मंदिर के माध्यम से इस पावन पूजा में सहभागी बनें और भगवान शिव की कृपा से कालसर्प दोष से राहत तथा जीवन में शांति और संतुलन की कामना करें।