“ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः” यह मंत्र मन को संतुलित करने से जुड़ा माना जाता है, विशेष रूप से तब जब विचार उलझने लगते हैं और सही दिशा समझ में नहीं आती। जब जीवन में स्पष्टता कम होने लगती है, तब मेहनती और बुद्धिमान व्यक्ति भी अधिक सोचने, बिना कारण डर महसूस करने, निर्णय न ले पाने और बार-बार गलत चुनाव करने जैसी स्थितियों से गुजरने लगते हैं। प्रयास पूरे होते हैं, नीयत भी साफ होती है, फिर भी परिणाम अस्थिर लगते हैं और मन थका हुआ महसूस करता है। सनातन परंपरा में इस मानसिक असंतुलन को भगवान श्री राहु देव के प्रभाव से जोड़ा गया है, जिनकी ऊर्जा हमारी सोच, समझ और निर्णय क्षमता को प्रभावित करती है।
राहु ग्रह का प्रभाव अक्सर धीरे-धीरे काम करता है। यह मन में बेचैनी, बिना कारण चिंता, भविष्य का डर और अपने ही निर्णयों पर संदेह पैदा कर सकता है। व्यक्ति को लगता है जैसे मन कई दिशाओं में खिंच रहा हो, या वह बार-बार एक ही तरह के विचारों में उलझ रहा हो जिससे आत्मविश्वास कम होने लगता है। शास्त्रों में इस स्थिति को राहु की छाया कहा गया है, जिसमें स्पष्टता भीतर होते हुए भी आसानी से दिखाई नहीं देती।
72,000 राहु मंत्र जाप क्यों किया जाता है?
कलियुग में सुधार के लिए जो साधना बताई गई है वह अनुशासित और क्रमबद्ध होती है। राहु मूल मंत्र का 18,000 बार जाप एक पूर्ण चक्र माना जाता है। जब यही जाप 4 बार किया जाता है तो कुल संख्या 72,000 (4 × 18,000) हो जाती है। इसी कारण इस अनुष्ठान को विशेष प्रभावशाली माना जाता है।
यह 4 चरणों में किया गया मंत्र जाप धीरे-धीरे मन के विचारों को स्थिर करने, जल्दबाजी में निर्णय लेने की प्रवृत्ति को कम करने और डर आधारित सोच को शांत करने में सहायक माना जाता है। जैसे-जैसे मंत्र जाप आगे बढ़ता है, मानसिक धुंध कम होने लगती है और निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है।
मान्यता है कि राहु देव जल्दबाजी से नहीं, बल्कि निरंतर और सही विधि से की गई साधना से प्रसन्न होते हैं। अधिक संख्या में मंत्र जाप को मन और कर्म दोनों के स्तर पर एक गहरी शुद्धि की प्रक्रिया माना जाता है, जो भ्रम की परतों को धीरे-धीरे हटाता है। जब राहु देव शांत होते हैं, तो वही ऊर्जा जो पहले भ्रम देती थी, आगे चलकर तेज बुद्धि, सही रणनीति और अचानक मिलने वाले सकारात्मक अवसरों का कारण बनती है। मंत्र जाप के बाद किया जाने वाला दशांश हवन इस साधना को पूर्ण करता है। हवन में दी जाने वाली आहुतियाँ चिंता, भ्रम और नकारात्मक सोच को अग्नि में समर्पित करने का प्रतीक मानी जाती हैं। इससे राहु का अशांत प्रभाव कम होकर मन में सुरक्षा और शांति का भाव बढ़ता है।
एकादशी की पवित्र तिथि पर किया गया यह अनुष्ठान और भी अधिक फलदायी माना जाता है। इस विशेष राहु शांति पूजा के माध्यम से साधक अपने विचारों, निर्णयों और पूरे जीवन में संतुलन, स्पष्टता और मानसिक स्थिरता का अनुभव कर सकता है।