🌕 फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन लगने वाला चंद्र ग्रहण वैदिक परंपरा में अत्यंत शक्तिशाली और दुर्लभ आध्यात्मिक समय माना जाता है। मान्यता है कि इस काल में किया गया मंत्र जाप, दान और पूजा सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक फलदायी होता है, क्योंकि इस समय मन, पितृ ऊर्जा और सूक्ष्म कर्म सीधे साधना से जुड़ते हैं। जब यह पावन अवसर हरिद्वार के गंगा घाट पर संपन्न होता है, तब इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
🌕 चंद्र देव को मन, भावनाओं और भीतर की संवेदनाओं का स्वामी माना गया है और उनका संबंध पितृ तत्व से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। वैदिक मान्यता के अनुसार चंद्रमा वंश, स्मृति और पूर्वजों से प्राप्त संस्कारों की ऊर्जा को पोषण देते हैं। जब उनका प्रभाव संतुलित होता है तो मन को शांति मिलती है, परिवार में आपसी प्रेम बढ़ता है और पितरों का आशीर्वाद सहज रूप से प्राप्त होने लगता है। इसलिए चंद्र ग्रहण के समय चंद्र देव की उपासना पितृ कृपा, भावनात्मक संतुलन और पूर्वजों से जुड़े असंतुलन को शांत करने के लिए विशेष मानी जाती है। यह केवल ग्रह शांति का अनुष्ठान नहीं, बल्कि मन और पितृ वंश के बीच सामंजस्य स्थापित करने की पवित्र साधना है।
🌕 हरिद्वार का गंगा घाट प्राचीन काल से पितरों को अर्पण करने का दिव्य द्वार माना गया है। मान्यता है कि जब चंद्र देव को कष्ट हुआ तब उन्होंने पवित्र जल में अर्घ्य अर्पित कर अपनी शांति और तेज को पुनः प्राप्त किया। उसी प्रकार इस पवित्र घाट पर चंद्र मंत्र जाप और अर्घ्य अर्पण करने से यह साधना पितृ लोक तक पहुँचती है, जिससे मन की अशांति कम होने, पूर्वजों से जुड़े कर्मों का भार हल्का होने और परिवार में स्थिरता व सामंजस्य आने की भावना जुड़ी है।
🌕 इस विशेष अनुष्ठान में 1,51,000 चंद्र मंत्रों का सामूहिक जाप, 101 ब्राह्मणों द्वारा महादान और चंद्र अर्घ्य पूजा की जाती है। मंत्र जाप मन और वंश की शुद्धि का प्रतीक है, दान पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और पुराने कर्म बंधनों को शांत करने का संकेत माना जाता है तथा अर्घ्य अर्पण जीवन में शांति, वंश की निरंतर उन्नति और भावनात्मक संतुलन के लिए प्रार्थना का माध्यम होता है।
🌕 आज के समय में परिवार में बार-बार आने वाली बाधाएँ, मन का भारीपन, आपसी एकता की कमी और अनजानी रुकावटें पारंपरिक मान्यता में पितृ दोष से जुड़ी मानी जाती हैं। इसलिए यह विशेष पूजा केवल ग्रहों के संतुलन के लिए नहीं, बल्कि पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करने, मन की स्थिरता, परिवार में एकता और पीढ़ियों तक कृपा के प्रवाह के लिए की जाती है। जब यह साधना चंद्र ग्रहण जैसे प्रभावशाली समय में हरिद्वार में की जाती है, तब इसे पितृ कृपा प्राप्त करने, मन को शांति देने और जीवन में स्थायी संतुलन स्थापित करने का दिव्य माध्यम माना जाता है।