मंगलवार के पावन दिन आयोजित होने वाला बगलामुखी–प्रत्यंगिरा 36 ब्राह्मण महानुष्ठान जीवन में सुरक्षा, साहस और आंतरिक स्थिरता की भावना को जागृत करने वाला एक विशेष आध्यात्मिक अवसर माना जाता है। जब विद्वान ब्राह्मणों द्वारा सामूहिक रूप से 1,25,000 बगलामुखी मूल मंत्र जाप और वैदिक हवन संपन्न किया जाता है, तब यह साधना केवल एक पूजा न होकर श्रद्धा, अनुशासन और सामूहिक प्रार्थना की दिव्य ऊर्जा का स्वरूप बन जाती है। ऐसी आराधना व्यक्ति के भीतर छिपे भय को शांत करने और सकारात्मकता को बढ़ाने की प्रेरणा देती है।
कई बार जीवन में बिना स्पष्ट कारण के मानसिक अस्थिरता, विरोध, रुकावटें या अनजाना डर महसूस होने लगता है। आध्यात्मिक परंपराओं में इसे सूक्ष्म नकारात्मक प्रभावों से जोड़ा जाता है। ऐसी स्थिति में देवी की रक्षक शक्ति का स्मरण मन को स्थिर करने और आत्मविश्वास बढ़ाने का माध्यम माना जाता है। यह संयुक्त साधना साधक के भीतर साहस, स्पष्टता और संतुलन की भावना को मजबूत करने का प्रतीक है।
माँ बगलामुखी का दिव्य स्वरूप
दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या माँ बगलामुखी को स्तंभन शक्ति की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। उनका स्मरण वाणी, विचार और विरोधी परिस्थितियों को शांत करने की भावना से किया जाता है। पीले वस्त्रों और पीत आभा से अलंकृत माँ का स्वरूप यह संदेश देता है कि व्यक्ति धैर्य और संयम से जीवन की चुनौतियों पर विजय पा सकता है।
माँ प्रत्यंगिरा की रक्षक शक्ति
माँ प्रत्यंगिरा को दिव्य रक्षा शक्ति का प्रतीक माना जाता है। परंपराओं में उनका स्वरूप व्यक्ति के चारों ओर सुरक्षा कवच की भावना जगाने से जुड़ा है। उनकी उपासना साहस, निर्भयता और नकारात्मक प्रभावों से संरक्षण की प्रार्थना के रूप में की जाती है, जिससे मन में दृढ़ता और आत्मविश्वास का संचार होता है।
मंगलवार का दिन इन उग्र और रक्षक स्वरूप वाली देवियों की साधना के लिए विशेष शुभ माना गया है। इस दिन मंत्र जाप, कवच पाठ और हवन के साथ किया गया स्मरण साधना के वातावरण को और अधिक शक्तिशाली और अनुशासित बनाता है।
श्री मंदिर के माध्यम से हो रहे इस सामूहिक अनुष्ठान में भक्त अपने नाम से संकल्प जोड़कर सम्मिलित हो सकते हैं। श्रद्धा से जुड़कर साधक देवी की कृपा, आंतरिक सुरक्षा और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव करने की भावना से इस दिव्य साधना का हिस्सा बन सकता है।