सनातन परंपरा में कुछ पावन अवसर ऐसे माने जाते हैं जिन्हें साधना, संयम और अंतर्मुखी चिंतन से जोड़ा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इन विशेष दिनों में किया गया जप, ध्यान और देवी स्मरण मन को स्थिर करने और विचारों को स्पष्ट करने में सहायक होता है। यह समय व्यक्ति को बाहरी उलझनों से हटकर भीतर संतुलन स्थापित करने की प्रेरणा देता है, इसलिए इसे शांति, धैर्य और आत्मबल से जुड़ी साधनाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
इसी आध्यात्मिक पृष्ठभूमि में श्री पीताम्बरा पीठ का विशेष महत्व बताया जाता है। यह पीठ दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या मां बगलामुखी को समर्पित है, जहां उनकी स्तम्भन शक्ति का भाव प्रमुख रूप से अनुभव किया जाता है। परंपराओं के अनुसार यह शक्ति अन्याय, अव्यवस्था और नकारात्मक प्रवृत्तियों को शांत करने की भावना से जुड़ी मानी जाती है। इस पावन अवसर पर इस पीठ में की जाने वाली उपासना को विशेष महत्व दिया जाता है, क्योंकि यह साधना संयम, संतुलन और मानसिक स्पष्टता की प्रेरणा देती है।
जब जीवन में कानूनी मामलों की जटिलता बढ़ने लगे, विरोध या दबाव के कारण मानसिक शांति प्रभावित हो, या निर्णय लेते समय भ्रम उत्पन्न होने लगे, तब व्यक्ति भीतर से अस्थिर महसूस कर सकता है। धार्मिक दृष्टि से ऐसे समय साधना का उद्देश्य परिस्थितियों को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि मन और बुद्धि को स्थिर करना माना जाता है। इसी भाव से मां बगलामुखी का स्मरण किया जाता है, ताकि व्यक्ति अपने भीतर धैर्य, विवेक और संतुलन बनाए रख सके।
इस अवसर पर श्री पीताम्बरा पीठ में किया जाने वाला मां बगलामुखी हवन पूर्ण वैदिक विधि से संपन्न किया जाता है। यह साधना किसी के प्रति हानि की भावना से नहीं, बल्कि नकारात्मक प्रभावों को शांत करने और मानसिक भय को कम करने के भाव से जुड़ी मानी जाती है। इसमें साधक अपने विचारों को स्थिर करने, भय से मुक्त होकर परिस्थितियों को स्पष्ट दृष्टि से देखने की प्रार्थना करता है।
यदि आप इस पावन अवसर पर मां बगलामुखी की उपासना को अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहते हैं, तो श्री मंदिर के माध्यम से श्री पीताम्बरा पीठ में संपन्न होने वाली इस विशेष पूजा से जुड़ सकते हैं।