🔱9 दिनों तक अखंड गंध अभिषेक और दुर्गा सप्तशती पाठ के माध्यम से 9 शक्तिपीठों की दिव्य शक्ति का आह्वान करें और जीवन में सुरक्षा, सफलता का आशीर्वाद पाएं तथा बाधाओं को दूर करें।🔱
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9 दिन अखंड 9 शक्तिपीठ गंध अभिषेक विशेष

9 दिन 9 शक्तिपीठ गंध अभिषेक और 13 अध्याय दुर्गा सप्तशती पाठ पूजा

जीवन की रक्षा, नकारात्मकता और बाधाओं को दूर करने के लिए, कार्यों में सफलता और
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कालीघाट शक्तिपीठ, ललिता माता शक्तिपीठ, माँ तारापीठ शक्तिपीठ, माँ विंध्यवासिनी शक्तिपीठ, महालक्ष्मी अंबाबाई शक्तिपीठ, उमा कात्यायनी शक्तिपीठ, भद्रकाली शक्तिपीठ, त्रिपुरा सुंदरी शक्तिपीठ, मंगला गौरी शक्तिपीठ, कोलकाता, पश्चिम बंगाल; प्रयागराज, उत्तर प्रदेश; बीरभूम, पश्चिम बंगाल; मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश; कोल्हापुर, महाराष्ट्र; वृंदावन, उत्तर प्रदेश; कुरुक्षेत्र, हरियाणा; उदयपुर, त्रिपुरा; गया, बिहार।
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🔱9 दिनों तक अखंड गंध अभिषेक और दुर्गा सप्तशती पाठ के माध्यम से 9 शक्तिपीठों की दिव्य शक्ति का आह्वान करें और जीवन में सुरक्षा, सफलता का आशीर्वाद पाएं तथा बाधाओं को दूर करें।🔱

सनातन परंपरा में दुर्गा सप्तशती को माँ भगवती को समर्पित सबसे शक्तिशाली ग्रंथों में से एक माना जाता है। इसमें कुल 13 पवित्र अध्याय और 700 श्लोक हैं, जिनमें देवी की दिव्य शक्ति और नकारात्मक शक्तियों पर उनकी विजय का वर्णन मिलता है। इन अध्यायों में बताया गया है कि माँ दुर्गा किस प्रकार संसार की रक्षा करती हैं, बुराई का नाश करती हैं और अपने भक्तों को साहस, समृद्धि और सुरक्षा का आशीर्वाद देती हैं। श्रद्धा और भक्ति के साथ दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं, नकारात्मकता कम होती है और जीवन में देवी की शक्ति जागृत होती है।

इसी पवित्र भावना के साथ 9 दिन अखंड 9 शक्तिपीठ गंध अभिषेक और 13 अध्याय दुर्गा सप्तशती पाठ-पूजा का आयोजन किया जा रहा है। यह पूजा भारत के नौ पवित्र शक्तिपीठों में संपन्न होगी। इस विशेष आध्यात्मिक अनुष्ठान के माध्यम से माँ दुर्गा की दिव्य शक्ति का आह्वान किया जाएगा और भक्तों को कई शक्तिपीठों की संयुक्त कृपा प्राप्त करने का अवसर मिलेगा।

इन नौ दिनों तक लगातार अलग-अलग नौ शक्तिपीठों में माँ भगवती का गंध अभिषेक किया जाएगा। गंध अभिषेक में रोली और कुमकुम से बना पवित्र लेप देवी के स्वरूप पर अर्पित किया जाता है। देवी की उपासना में गंध का विशेष महत्व माना जाता है और यह माँ भगवती को अत्यंत प्रिय है। जब इस गंध को अभिषेक के रूप में अर्पित किया जाता है, तो यह भक्त की श्रद्धा, पवित्रता और भक्ति का प्रतीक बनता है। ऐसा माना जाता है कि इससे जीवन में शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का आगमन होता है। दरअसल यह गंध वही लाल तिलक है जो परंपरागत रूप से माँ दुर्गा को अर्पित किया जाता है और उनकी शक्ति तथा रक्षा का प्रतीक माना जाता है।

गंध अभिषेक के साथ-साथ नौ दिनों तक प्रतिदिन 13 अध्याय दुर्गा सप्तशती का पाठ भी किया जाएगा। हर दिन यह पाठ एक अलग शक्तिपीठ में होगा। जब दुर्गा सप्तशती का पाठ शक्तिपीठ जैसे पवित्र स्थानों पर किया जाता है, तो इसका आध्यात्मिक प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे भक्त के जीवन में देवी की कृपा से सुरक्षा, सकारात्मक ऊर्जा और आशीर्वाद का एक शक्तिशाली घेरा बनता है।

जिन नौ पवित्र शक्तिपीठों में यह पूजा की जाएगी, वे हैं-
• कालीघाट शक्तिपीठ
• ललिता माता शक्तिपीठ
• माँ तारापीठ शक्तिपीठ
• माँ विंध्यवासिनी शक्तिपीठ
• महालक्ष्मी अंबाबाई शक्तिपीठ
• उमा कात्यायनी शक्तिपीठ
• भद्रकाली शक्तिपीठ
• त्रिपुरा सुंदरी शक्तिपीठ
• मंगला गौरी शक्तिपीठ

इन सभी शक्तिपीठों को अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली माना जाता है। वहीं एक ही अनुष्ठान में इन नौ शक्तिपीठों में पूजा का आयोजन होना बहुत दुर्लभ और अत्यंत शुभ माना जाता है।
आप भी श्री मंदिर के माध्यम से इस पवित्र नौ दिवसीय अनुष्ठान में अपना संकल्प जोड़ सकते हैं और माँ दुर्गा से जीवन की रक्षा, नकारात्मकता और बाधाओं से मुक्ति, कार्यों में सफलता और अपने जीवन के चारों ओर देवी का दिव्य सुरक्षा कवच प्राप्त करने की प्रार्थना कर सकते हैं।

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कालीघाट मंदिर, कोलकाता:
ऐसा माना जाता है कि यहाँ माता सती के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था। इस स्थान पर माँ काली का उग्र रूप विराजमान है, जो शक्ति और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है।
माँ ललिता देवी मंदिर, प्रयागराज:
यह मंदिर त्रिवेणी संगम के पास स्थित है और 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि यहाँ माता सती की उंगली गिरी थी। यहाँ माँ त्रिपुरा सुंदरी की तीन रूपों में पूजा की जाती है।

श्री तारापीठ मंदिर, बीरभूम:
मान्यता है कि यहाँ माता सती की आँख गिरी थी, जिसे बंगाली में “तारा” कहा जाता है। माँ तारा को दस महाविद्याओं में दूसरा स्थान दिया गया है। प्रसिद्ध संत वामाख्येपा ने यहीं साधना करके आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त की थी।

माँ विंध्यवासिनी मंदिर, मिर्जापुर:
यह मंदिर विंध्य पर्वत पर स्थित है और भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि यहाँ माता सती के बाएँ पैर का अंगूठा गिरा था। यहाँ देवी की जागृत रूप में पूजा होती है और उन्हें महिषासुर मर्दिनी कहा जाता है। शिव पुराण में भी इस मंदिर का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि भगवान राम ने भी यहाँ आकर देवी की पूजा की थी। कुछ मान्यताओं के अनुसार माँ विंध्यवासिनी को भगवान कृष्ण की बहन योगमाया भी माना जाता है।

शक्तिपीठ महालक्ष्मी अंबाबाई, कोल्हापुर:
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित श्री महालक्ष्मी अंबाबाई मंदिर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है। प्राचीन मान्यता के अनुसार यहाँ माता सती की दोनों आँखें गिरी थीं और तभी से माँ लक्ष्मी यहाँ विराजमान हैं। यह मंदिर लगभग 7,000 वर्ष पुराना माना जाता है और यहाँ स्थापित माँ लक्ष्मी की मूर्ति को दिव्य और चमत्कारी माना जाता है। साल में दो बार सूर्य की किरणें सीधे माँ लक्ष्मी के चरणों पर पड़ती हैं और उस समय मंदिर में किरणोत्सव मनाया जाता है।

माँ कात्यायनी मंदिर, वृंदावन:
ऐसा माना जाता है कि यहाँ माता सती के बाल गिरे थे। इस मंदिर में माँ कात्यायनी (पार्वती) की पूजा की जाती है। इस मंदिर की स्थापना भक्त केशवानंद महाराज ने की थी। इसे उमा देवी शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है।

भद्रकाली मंदिर, कुरुक्षेत्र:
इस मंदिर को सावित्री पीठ, देवी पीठ और कालिका पीठ के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि यहाँ माता सती की दाहिनी एड़ी गिरी थी। शिव और विष्णु से जुड़ी कथाओं के कारण यह स्थान एक शक्तिशाली आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है। यहाँ पूजा करने से साहस, सुरक्षा और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होने की मान्यता है।

त्रिपुरा सुंदरी शक्तिपीठ, उदयपुर (त्रिपुरा):
त्रिपुरा सुंदरी शक्तिपीठ, जिसे माताबारी भी कहा जाता है, त्रिपुरा के उदयपुर के पास स्थित है। यह पूर्वी भारत में शक्ति उपासना का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहाँ माँ त्रिपुरा सुंदरी, जिन्हें माँ षोडशी भी कहा जाता है, की पूजा की जाती है। यह मंदिर पूरे राज्य का प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है।

मंगला गौरी शक्तिपीठ, गया:
गया के भस्मकूट पर्वत पर माता सती के स्तन गिरने की मान्यता है, जो बाद में दो पत्थरों के रूप में प्रकट हुए और वहीं माँ मंगला गौरी का स्थान माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि जो भी भक्त इन पत्थरों को स्पर्श करता है, उसे अमरत्व का आशीर्वाद मिल सकता है। कहा जाता है कि जो भक्त सच्चे मन से यहाँ आकर देवी की पूजा करते हैं, उनकी मनोकामनाएँ माँ अवश्य पूरी करती हैं।

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