सनातन धर्म में प्रत्येक दिन किसी न किसी देवता को समर्पित होता है। ऐसे ही शनिवार का दिन शनिदेव को समर्पित है। मान्यता है कि न्याय और कर्मों के देवता शनिदेव व्यक्ति को उसके अच्छे और बुरे कर्मों के अनुसार फल देते हैं इसीलिए उनको कर्मफलदाता भी कहा जाता है। शनि के प्रकोप के संदर्भ में ऐसा माना जाता है कि अगर किसी व्यक्ति पर शनि की दृष्टि पड़ जाए, तो उस व्यक्ति को अपने जीवन में कई सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। वहीं अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में शनि अनुकूल स्थिति में हों, तो वह जीवन में बड़ी सफलता प्राप्त कर सकते हैं। यही कारण है कि, माना जाता है जो भी भक्त शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा करते हैं उनके जीवन से शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या से राहत मिलती है। मान्यता यह भी है कि शनिवार के दिन दुनिया के सबसे बड़े मंदिरों मे से एक शनि शिंगणापुर में शनि पूजा करने से शनि के अशुभ प्रभावों से राहत मिलती है।
शनिदेव के इस मंदिर को 'जागृत देवस्थान' के रूप में जाना जाता है, जिसका अर्थ है कि यहां शनिदेव स्वयं पत्थर की मूर्ति के रूप में विराजमान हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस प्राचीन मंदिर में शनि पूजा और तिल तेल चढ़ाने से शनि साढ़ेसाती के कष्टों से राहत मिल सकती है। ज्योतिष शास्त्र में शनि की साढ़ेसाती को सामान्यत: प्रतिकूल समय माना जाता है, इसके प्रभाव को ढाई-ढाई साल के तीन चरणों में विभाजित किया गया है। वहीं शनि की महादशा 19 साल तक चलती है। इस दौरान शनि कुंडली में ग्रह की स्थिति और व्यक्तिगत कर्मों के आधार पर दोनों प्रकार के, यानी सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव डालता है। शनि के अशुभ प्रभाव से राहत पाने के लिए शनि साढ़ेसाती शांति महापूजा, शनि तिल तेल अभिषेक और महादशा शांति महापूजा को अत्यंत फलदायी माना जाता है। आप भी श्री मंदिर के माध्यम से इस शनिवार को होने वाली इस विशेष पूजा में भाग लें और शनिदेव का दिव्य आशीर्वाद प्राप्त करें।