सनातन धर्म में त्रयोदशी तिथि का विशेष महत्व है। इसे प्रदोष के नाम से भी जाना जाता है। यह तिथि भगवान शिव एवं माता पार्वती की पूजा के लिए सबसे शुभ तिथियों में से एक है। मान्यता है कि त्रयोदशी पर भगवान शिव की पूजा करने से कुंडली में मौजूद सभी प्रकार के दोषों से मुक्ति मिलती है। इस बार त्रयोदशी तिथि पर स्वाति नक्षत्र भी लग रहा है और स्वाती नक्षत्र राहु द्वारा शासित है। ऐसे में यह समय राहु-केतु पीड़ा शांति पूजा के लिए सबसे शुभ समय है। इसलिए कृष्ण त्रयोदशी एवं स्वाति नक्षत्र के शुभ संयोग पर हरिद्वार के प्राचीन पशुपतिनाथ मंदिर में राहु-केतु पीड़ा शांति पूजा और शिव रुद्राभिषेक का आयोजन किया जा रहा है। आप भी श्री मंदिर के माध्यम से इस पूजा में भाग लेकर मानसिक स्पष्टता एवं बेहतर निर्णय लेने का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, राहु एवं केतु छाया ग्रह है और यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में राहु-केतु की दशा चल रही हो, तो इससे प्रयासों में असफलता, पारिवारिक कलह, बुरी आदतों की लत, आर्थिक तंगी और निर्णय लेने में कठिनाई की संभावना बढ़ जाती है। यदि आप भी ऐसी समस्याओं से जूझ रहे हैं तो आप भी राहु-केतु पीड़ा से पीड़ित हो सकते हैं।
राहु एवं केतु एक ही असुर के शरीर के दो हिस्से हैं। इसके पीछे एक पौराणिक कथा है, जिसमें बताया गया है कि जब देवता और असुर अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र का मंथन कर रहे थे, तब समुद्र से अमृत कलश प्राप्त हुआ। भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाना शुरू किया, लेकिन असुरों को इससे वंचित रखा। स्वरभानु नामक एक असुर ने देवताओं का रूप धारण कर अमृत पान कर लिया। सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया और भगवान विष्णु को इसकी सूचना दी। विष्णु जी ने तुरंत अपने सुदर्शन चक्र से स्वरभानु का सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन चूंकि उसने अमृत पान कर लिया था, इसलिए उसका सिर "राहु" और धड़ "केतु" के रूप में अमर हो गए। भगवान शिव राहु और केतु के देवता है। इसी कारणवश माना जाता है कि त्रयोदशी तिथि एवं स्वाति नक्षत्र के शुभ संयोग पर यह विशेष अनुष्ठान करने से मानसिक स्पष्टता एवं बेहतर निर्णय लेने का आशीर्वाद प्राप्त होता है। आप भी श्री मंदिर के माध्यम से इस पूजा में भाग लें और राहु-केतु पीड़ा से राहत पाएं।