फाल्गुन शुक्ल एकादशी सनातन परंपरा में भगवान श्री नारायण को समर्पित अत्यंत शुभ और फलदायी तिथि मानी जाती है। शुक्ल पक्ष की एकादशी को वृद्धि, प्रकाश और सकारात्मक आरंभ का प्रतीक माना जाता है। इस दिन किया गया व्रत, जप और यज्ञ जीवन में अटकी हुई परिस्थितियों को आगे बढ़ाने और मानसिक स्पष्टता लाने से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि एकादशी पर भगवान नारायण की उपासना से साधक को धैर्य, संतुलन और सही निर्णय लेने की शक्ति मिलती है, जिससे जीवन के जटिल संघर्षों का सामना करना आसान होता है।
इसी पावन तिथि पर भगवान श्री नारायण और माँ बगलामुखी की संयुक्त उपासना का विशेष महत्व है। भगवान नारायण संरक्षण, धर्म और न्याय के प्रतीक माने जाते हैं, जबकि माँ बगलामुखी शत्रु बाधा, कानूनी संघर्ष और नकारात्मक शक्तियों को शांत करने वाली देवी के रूप में पूजी जाती हैं। जब एकादशी के दिन इन दोनों दिव्य शक्तियों की आराधना साथ में की जाती है, तो इसे जीवन की उलझी हुई कानूनी लड़ाइयों को सुलझाने, विरोधियों पर विजय पाने और सुरक्षा की भावना मजबूत करने वाला अनुष्ठान माना जाता है।
पुराणों में वर्णन है कि जब सृष्टि पर संकट गहराया, तब भगवान विष्णु की तपस्या से माँ बगलामुखी प्रकट हुईं और विनाशकारी शक्तियों को शांत कर संतुलन स्थापित किया। यह कथा नारायण और बगलामुखी की संयुक्त शक्ति का प्रतीक है। माँ बगलामुखी, दस महाविद्याओं में से एक, साधक को साहस और रक्षा का आशीर्वाद देती हैं, जबकि भगवान नारायण का सुदर्शन चक्र अन्याय और अधर्म को समाप्त करने की शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
इसी महत्व के साथ फाल्गुन शुक्ल एकादशी पर हरिद्वार के सिद्धपीठ माँ बगलामुखी मंदिर में 36,000 मंत्र जाप और मथुरा के श्री दीर्घ विष्णु मंदिर में नारायण सुदर्शन कवच यज्ञ का आयोजन किया जाता है। यह संयुक्त अनुष्ठान कानूनी लड़ाइयों में सफलता, दुश्मनी से रक्षा और जीवन में स्थिरता के आशीर्वाद की भावना से किया जाता है।
श्री मंदिर के माध्यम से भक्त इस दिव्य एकादशी अनुष्ठान में भाग लेकर माँ बगलामुखी और भगवान श्री नारायण की संयुक्त कृपा का आह्वान कर सकते हैं, ताकि जीवन में विजय, सुरक्षा और संतुलन का मार्ग मजबूत हो सके।