🪔 हिंदू ज्योतिष के अनुसार, साढ़ेसाती तब शुरू होती है जब शनि देव चंद्र राशि से बारहवें भाव में प्रवेश करते हैं, फिर चंद्र राशि पर और उसके बाद दूसरे भाव में जाते हैं। यह अवधि कुल साढ़े सात वर्ष तक चलती है। शास्त्रों में इसे दंड नहीं बल्कि कर्मों की परीक्षा का समय माना गया है, जिसमें व्यक्ति को अपने पुराने कर्मों का फल मिलता है। इसी कारण इस समय देरी, मानसिक दबाव, रुकावटें और संघर्ष बढ़ जाते हैं।
🪔 प्राचीन ग्रंथों और परंपरागत शनि उपासना के अनुसार, साढ़ेसाती से राहत के लिए केवल एक पूजा पर्याप्त नहीं मानी जाती। शनि देव को मंत्र जाप, अभिषेक, सेवा और करुणा– इन सभी के साथ पूजा करने से प्रसन्न माना जाता है। इसी कारण शनि शांति के लिए ये चार अनुष्ठान विशेष माने जाते हैं:
🪐 शनि मूल मंत्र जाप – बार-बार आने वाली रुकावटों, देरी और ठहराव के मुख्य कारणों को शांत करने के लिए किया जाता है।
🪐 शनि तिल तेल अभिषेक – यह शनि देव की तीव्र ऊर्जा को शांत करने में सहायक माना जाता है। इससे कर्ज, विवाद, कानूनी दबाव और मानसिक बोझ में कमी आने की मान्यता है।
🪐 शनि महा सेवा – यह सेवा विनम्रता, अनुशासन और जिम्मेदारी को दर्शाती है, जो शनि देव को प्रिय गुण माने जाते हैं। यह भक्त को सही कर्म मार्ग पर आगे बढ़ने में सहायता करती है।
🪐 कौआ सेवा – कौआ शनि देव का दूत माना जाता है। उसे भोजन देना और सेवा करना शनि देव को प्रसन्न करने का सरल उपाय माना जाता है, जिससे दोष और रुकावटें कम होती हैं।
🪔 यह सभी चार विशेष अनुष्ठान उज्जैन के नवग्रह शनि मंदिर में किए जाते हैं, जो ग्रह शांति पूजा के लिए प्रसिद्ध है। प्राचीन समय से उज्जैन को ग्रह उपासना का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यहां शनि देव की पूजा अन्य नवग्रहों के साथ की जाती है, जिससे साढ़ेसाती का प्रभाव कम होने की मान्यता है। श्री मंदिर के माध्यम से भक्तों को पूजा के साथ शनि महा सेवा और कौआ सेवा जैसी जरूरी सेवाएं भी एक साथ मिलती हैं, जिन्हें अलग-अलग करना आसान नहीं होता।