होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि राधा–कृष्ण के दिव्य प्रेम का उत्सव है, और वृंदावन उस प्रेम की सबसे पवित्र भूमि मानी जाती है। यहाँ खेली जाने वाली होली में रंग केवल चेहरे पर नहीं, बल्कि हृदय पर चढ़ते हैं। यही कारण है कि इस दिन राधा–कृष्ण को गुलाल और पुष्प अर्पित करना किसी इच्छा की पूर्ति के लिए नहीं, बल्कि निस्वार्थ प्रेम समर्पित करने का प्रतीक माना जाता है।
इस विशेष पूजा में 21 किलो गुलाल और 7 किलो पुष्प श्री राधा–कृष्ण के श्री विग्रह पर अर्पित किए जाते हैं। यह अर्पण भक्त और भगवान के बीच उस प्रेम का संकेत है जिसमें कोई मांग नहीं होती, केवल समर्पण होता है। जब भक्त प्रेम अर्पित करता है, तब राधा रानी की कृपा अपने आप बरसती है और जीवन में खुशी, भावनात्मक संतुलन और संबंधों में मधुरता आने लगती है।
वृंदावन की होली का वर्णन शास्त्रों और संतों ने दिव्य बताया है- मंदिरों की घंटियों की ध्वनि, पुष्पों की सुगंध, कोमल रंगों की छटा और राधा नाम का मधुर संकीर्तन वातावरण को प्रेममय बना देता है। इसी प्रेम भाव को जागृत करने के लिए 108 राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र का पाठ किया जाता है। मान्यता है कि यह स्तोत्र राधा रानी की करुणा को शीघ्र आकर्षित करता है और भक्त के जीवन में प्रेम, अपनापन और भावनात्मक पूर्णता का आशीर्वाद देता है।
आज के समय में कई बार जीवन में सब कुछ होते हुए भी भीतर खालीपन महसूस होता है, रिश्तों में मिठास कम होने लगती है और मन सच्ची खुशी खोजता रहता है। राधा–कृष्ण की यह दिव्य होली साधना उस प्रेम को जगाने का माध्यम मानी जाती है जो जीवन को भीतर से पूर्ण बना देता है। यह पूजा हमें सिखाती है — इस होली मांगना नहीं, प्रेम अर्पित करना है, क्योंकि जहाँ सच्चा प्रेम होता है वहाँ कृपा अपने आप बरसती है।
श्री मंदिर के माध्यम से इस पावन वृंदावन होली उत्सव में अपने नाम से संकल्प जोड़कर आप भी राधा–कृष्ण के चरणों में प्रेम अर्पित कर सकते हैं और उनके दिव्य आशीर्वाद से जीवन में सुख, मधुर संबंध और भावनात्मक संतोष प्राप्त कर सकते हैं।