हिंदू वर्ष की अंतिम एकादशी भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का अत्यंत पवित्र और जागृत समय माना जाता है। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि पूरे वर्ष की भावनाओं, प्रार्थनाओं और अधूरे संकल्पों को भगवान के चरणों में समर्पित करने का दिव्य अवसर होता है। मान्यता है कि इस दिन की गई साधना आने वाले नए वर्ष के लिए शुभ आधार तैयार करती है। विशेष रूप से विवाह, सही जीवनसाथी की प्राप्ति और रिश्तों में स्थिरता के लिए यह समय बहुत फलदायी माना गया है।
जीवन में कई बार ऐसा होता है कि सब कुछ ठीक होने के बाद भी विवाह की बात आगे नहीं बढ़ती, अच्छे रिश्ते बनते-बनते रुक जाते हैं या संबंधों में बार-बार गलतफहमियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इसका एक महत्वपूर्ण कारण बृहस्पति ग्रह का कमजोर या अशुभ होना माना जाता है। बृहस्पति ग्रह को विवाह, भाग्य, सद्बुद्धि, धर्म और सही निर्णय का कारक कहा गया है। जब बृहस्पति देव का आशीर्वाद मिलता है, तब जीवन में सही व्यक्ति का प्रवेश होता है और रिश्तों में सम्मान, विश्वास और स्थायी सुख का भाव आता है।
इसी पावन भावना के साथ इस विशेष एकादशी पर 16,000 बृहस्पति ग्रह मूल मंत्र जाप और सुदर्शन हवन का आयोजन किया जा रहा है। देवगुरु बृहस्पति की उपासना से विवाह में आ रही बाधाओं को शांत करने, योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति और रिश्तों में मधुरता बढ़ाने की प्रार्थना की जाती है। वहीं भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र जीवन से नकारात्मकता, भ्रम और बार-बार आने वाली रुकावटों को दूर करने का प्रतीक माना जाता है। जब मंत्र जाप और हवन एक साथ किए जाते हैं, तब यह साधना साधक के जीवन में सही दिशा, स्पष्ट सोच और संबंधों में संतुलन स्थापित करने का माध्यम बनती है।
एकादशी का दिन भगवान विष्णु को समर्पित होता है और भगवान विष्णु को पालनकर्ता कहा गया है, जो जीवन में संतुलन और स्थिरता प्रदान करते हैं। इसलिए इस दिन किया गया सुदर्शन हवन वैवाहिक जीवन में सुख, पारिवारिक समृद्धि और भावनात्मक शांति की कामना से विशेष माना जाता है। यह पूजा केवल विवाह के लिए नहीं, बल्कि पहले से बने रिश्तों में प्रेम, समझ और विश्वास को मजबूत करने के लिए भी उतनी ही प्रभावशाली मानी जाती है।
आज के समय में कई लोग अकेलेपन, रिश्तों में अस्थिरता, विवाह में देरी या भावनात्मक दूरी जैसी स्थितियों से गुजरते हैं। ऐसे में यह विशेष अनुष्ठान जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का आध्यात्मिक माध्यम बनता है। इसका भाव यह है कि साधक के जीवन से भ्रम दूर हो, सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़े और उसे ऐसा साथी मिले जो उसके जीवन को संतुलन, प्रेम और सम्मान से भर दे।
श्री मंदिर के माध्यम से अपने नाम से संकल्प जोड़कर आप इस दिव्य अनुष्ठान का भाग बन सकते हैं और देवगुरु बृहस्पति तथा भगवान विष्णु की कृपा से अपने जीवन में आदर्श जीवनसाथी, सुखद वैवाहिक जीवन और प्रेमपूर्ण संबंधों का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। यह साधना आने वाले नए वर्ष के लिए प्रेम, सामंजस्य और स्थायी खुशियों का मंगल संकल्प मानी जाती है।