जब व्यक्ति पूरी ईमानदारी से प्रयास करता है और भावनाएँ भी शुद्ध होती हैं, तब भी कई बार धन का संचय नहीं हो पाता। आय होती है, लेकिन स्थिरता बनी नहीं रहती। अचानक खर्च बढ़ जाते हैं, व्यवसाय में रुकावट आ जाती है और आर्थिक प्रगति जड़ से अटकी हुई महसूस होती है। सनातन धर्म में ऐसी स्थिति को यह संकेत माना गया है कि लक्ष्मी तत्त्व तो उपस्थित है, पर उसका सही रूप से संचय नहीं हो पा रहा। इसलिए ऐसी अवस्था में केवल सामान्य उपायों के बजाय गहन साधना को उपयोगी माना गया है।
पुराणों में वर्णन मिलता है कि माँ कमला दस महाविद्याओं में दसवीं महाविद्या हैं और वे खिले हुए कमल पर विराजमान मानी जाती हैं। मान्यता है कि वे सांसारिक समृद्धि से जुड़ी ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती हैं और दरिद्रता को मूल स्तर से दूर करने वाली देवी हैं। उनके साथ भगवान श्री कुबेर की उपासना की जाती है, जिन्हें भगवान श्री ब्रह्मा ने समस्त धन का रक्षक नियुक्त किया था। शास्त्रों में एक मान्यता यह भी बताई जाती है कि भगवान श्री कुबेर भी भगवान श्री स्वर्णाकर्षण भैरव की अनुमति के बिना धन प्रदान नहीं करते। स्वर्णाकर्षण भैरव को स्वर्ण भैरव कहा जाता है और उन्हें दिव्य कोष की व्यवस्था से जुड़ा माना जाता है। जब माँ कमला, भगवान कुबेर और भगवान स्वर्णाकर्षण भैरव की संयुक्त साधना की जाती है, तब नव निधि अर्थात नौ प्रकार के धन तत्त्वों की साधना पूर्ण मानी जाती है, जो जीवन में संतुलन और शांति से जुड़ी मानी जाती है।
हरिद्वार में होने वाले इस पवित्र महायज्ञ में ऐसे विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं, जिनका उद्देश्य साधक को इन दिव्य ऊर्जाओं से जोड़ना माना जाता है। इस यज्ञ में 11,000 कमलगट्टा, जिन्हें परंपरा में धन का बीज कहा जाता है, पवित्र अग्नि में अर्पित किए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इससे उत्पन्न आध्यात्मिक ऊष्मा आर्थिक रुकावटों से जुड़ी ऊर्जा को धीरे धीरे शिथिल करने में सहायक होती है। इसके साथ नौ पवित्र नदियों के जल और नौ रत्नों से युक्त धन वर्षा कलश की स्थापना की जाती है, जिसे मंत्रों द्वारा संस्कारित किया जाता है।
माँ कमला के साथ भगवान श्री स्वर्णाकर्षण भैरव की प्रार्थना कर समृद्धि से जुड़ी अनुमति की कामना की जाती है। इसके साथ ही गुप्त नवरात्रि की नवमी तिथि पर हरिद्वार में नव निधि महायज्ञ का आयोजन भी किया जाएगा, जिसमें 11,000 कमलगट्टा पवित्र अग्नि में समर्पित हैं। परंपरा के अनुसार, यह साधना आर्थिक अवरोधों और ठहराव से जुड़ी ऊर्जा पर कार्य करने का एक माध्यम मानी जाती है।
नौ पवित्र नदियों के जल, नौ रत्नों और पवित्र मुद्राओं से तैयार विशेष धन वर्षा कलश को नौ दिनों तक अन्न के ढेर में स्थापित किया जाता है, ताकि वह निरंतर समृद्धि से जुड़ी ऊर्जा को आत्मसात कर सके। आप भी श्री मंदिर के माध्यम से इस विशेष अनुष्ठान में भाग लें।