कई बार जीवन ऐसा लगता है जैसे एक समस्या समाप्त होती है तो दूसरी सामने आ जाती है। सच्चे प्रयास और साफ नीयत के बाद भी झूठे आरोप, कानूनी उलझनें, विरोधियों की बाधा या बार-बार होने वाली स्वास्थ्य समस्याएँ मन और शरीर पर भारी पड़ने लगती हैं।
शास्त्रों के अनुसार चंद्र ग्रहण एक दुर्लभ आध्यात्मिक काल होता है, जब सूक्ष्म ऊर्जा अत्यंत सक्रिय हो जाती है। इस समय मन अधिक संवेदनशील हो जाता है, पुराने भय सामने आने लगते हैं और छिपी हुई नकारात्मकता प्रभाव दिखा सकती है। इसलिए ग्रहण काल को सावधानी और श्रद्धा के साथ देखा जाता है।
लेकिन यही समय साधना के लिए सबसे प्रभावशाली भी माना गया है। ग्रहण के दौरान किया गया मंत्र जाप, यज्ञ और रक्षा अनुष्ठान सामान्य समय की तुलना में अधिक फलदायी माने जाते हैं। कहा जाता है कि इस काल में श्रद्धा से किया गया छोटा सा दीपक भी गहरी नकारात्मकता को दूर करने की शक्ति रखता है।
इसी दिव्य समय की ऊर्जा को रक्षा और परिवर्तन के लिए जागृत करने हेतु दशमहाविद्या पूजा की जाती है। पुराणों में वर्णन मिलता है कि जब देवताओं के सामने ऐसी शक्तियाँ आईं जिन्हें अकेले कोई नियंत्रित नहीं कर सकता था, तब माँ पार्वती ने दस महाशक्तियों के रूप में प्रकट होकर सभी दिशाओं को सुरक्षित किया। ये दसों महाविद्याएँ जीवन की अलग-अलग शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती है- कहीं रक्षा, कहीं ज्ञान, कहीं साहस और कहीं बाधाओं को शांत करने की शक्ति। मान्यता है कि चंद्र ग्रहण की रात्रि में इन दसों शक्तियों की साधना करने से साधक के चारों ओर एक दिव्य रक्षा कवच बनता है, जो नकारात्मक ऊर्जा, शत्रु बाधा और अनदेखी परेशानियों से सुरक्षा प्रदान करता है।
इस विशेष पूजा में ग्रहण काल के दौरान पवित्र आहुतियाँ, दिव्य मंत्र और विशेष सामग्री अग्नि में समर्पित की जाती है। यह ग्रहण दोष को शांत करने और जीवन में संतुलन स्थापित करने की प्रार्थना का प्रतीक है। जैसे ग्रहण के बाद चंद्रमा पुनः प्रकाशमान होता है, उसी प्रकार इस साधना से जीवन में शांति, स्वास्थ्य और स्थिरता आने की कामना की जाती है।
श्री मंदिर के माध्यम से इस पावन अनुष्ठान में सहभागी होकर आप दशमहाविद्याओं की कृपा से दिव्य रक्षा, स्वास्थ्य और मानसिक शांति का आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रार्थना कर सकते हैं।