🔱✨आषाढ़ पंचमी × शतभिषा नक्षत्र - वह दुर्लभ संयोग जब राहु का विष स्वयं औषधि बन जाता है - सर्प जनित कष्टों से शांति हेतु अभी नागेश्वर नाथ एवं राहु पैठाणी में अपने नाम से अर्पण का संकल्प लें।
समुद्र मंथन की घटना के बाद जब छल से अमृतपान करने के लिए श्री हरि ने राहु का सिर काटा तब वर्षों नागों के स्वामी शिव की तपस्या के बाद ही उसे छाया ग्रह होने का वरदान प्राप्त हुआ था।
वैदिक ज्योतिष के अनुसार - शिव 'नागेश्वर' (नागों के स्वामी) के रूप में राहु और केतु पर सीधा अधिकार रखते हैं। राहु अपने स्वभाव में सर्प-तत्व है - वह कुंडली में ग्रहों को उसी प्रकार जकड़ता है जैसे एक सर्प अपने शिकार को। किन्तु जो स्वयं सर्पों का राजा है, उसके भक्त को यह सर्प-ऊर्जा स्पर्श नहीं कर सकती। राहु की नकारात्मक ग्रह-ऊर्जा जो मन को अशांत करती है - वह शिव के लिए केवल एक छाया है।
🐍 शतभिषा नक्षत्र - राहु दोषों से शांति के लिए सर्व शक्तिशाली कैसे?
'शतभिषा' का अर्थ है - 'सौ वैद्यों की शक्ति'। यह राहु का वह नक्षत्र है जो पुराने कर्म-घावों, दीर्घकालिक बाधाओं और छिपे हुए शारीरिक-मानसिक रोगों का उपचार करता है। यह वह दुर्लभ काल है जब राहु की विनाशकारी ऊर्जा उपचार-ऊर्जा में रूपांतरित होने के लिए तत्पर है। शतभिषा के साथ नागों को समर्पित पंचमी तिथि का यह मेल इसे और भी अधिक प्रभावशाली बना देता है।
🛕दो सिद्ध मंदिर - एक सम्पूर्ण राहु-कवच:
श्री नागेश्वर नाथ मंदिर शिव के नागेश्वर स्वरूप की आराधना, पंचमी तिथि पर - नागों के स्वामी के रूप में राहु की सर्पीय ऊर्जा का स्वामित्व। श्री राहु पैठाणी मंदिर, उत्तराखंड भारत का एकमात्र मंदिर जहाँ राहु सीधे पूजे जाते हैं। स्कंद पुराण के अनुसार यहीं राहु का कटा हुआ मस्तक गिरा था। यहाँ राहु की अपनी भूमि पर, उनके अपने मंदिर में, उनसे सीधे क्षमायाचना - यह वह उपाय है जो किसी और स्थान पर सम्भव नहीं।
🙏राहु ने जब अपना अहंकार छोड़कर शिव की शरण ली - तभी उसे मुक्ति मिली। आषाढ़ पंचमी × शतभिषा के इस दिव्य संयोग पर नागेश्वर शिव और पैठाणी राहु दोनों के समक्ष अपना संकल्प रखें। अभी बुक करें।