4 तिथियाँ, 4 तीर्थ, 1 संकल्प! जहाँ माँ गंगा शुद्ध करें, कृष्ण कृपा करें, पितृ तृप्त हों और जगन्नाथ स्वीकार करें, पुरुषोत्तम मास की हर दिव्य तिथि पर साधु भोजन सेवा कर संपूर्ण मास का पुण्य संचित करें।
📙 पद्म पुराण, स्कंद पुराण और वैष्णव परंपरा में वर्णित है की अन्न सेवा सिर्फ भूख नहीं मिटाती, यह धर्म को जीवित रखती है। जब यह अन्न साधु-संतों को अर्पित किया जाए, तो यह परंपरा, ज्ञान और तप की ऊर्जा को समर्पण बन जाता है।
✡️ पुरुषोत्तम मास की चार निर्णायक तिथियाँ
🔸 पद्मिनी एकादशी: पुरुषोत्तम मास की शुक्ल पक्ष की दुर्लभ एकादशी जहाँ से इस काल का पहला आध्यात्मिक शिखर प्रारंभ होता है।
🔸 ज्येष्ठ अधिक मास पूर्णिमा: वह तिथि जहाँ इस मास की ऊर्जा मध्य में स्थिर होकर अपना प्रभाव स्थापित करती है।
🔸 परमा एकादशी: कृष्ण पक्ष की अंतिम एकादशी जहाँ साधना अपने गहन और निर्णायक चरण में प्रवेश करती है।
🔸 अधिक मास अमावस्या: समापन का वह क्षण जहाँ पूरा चक्र पूर्ण होकर अगली दिशा के लिए मार्ग तैयार करता है।
🛕 4 तीर्थ साधु भोजन सेवा
🔸 गंगा घाट: जहाँ गंगा का प्रवाह कर्मशुद्धि और पापक्षय से जुड़ा माना गया है। यहाँ साधु सेवा आत्मिक शुद्धि स्थापित करती है।
🔸 विश्राम घाट: श्रीकृष्ण का विश्राम स्थल जहाँ सेवा से जीवन के तनाव और असंतुलन में शांति मिलती है।
🔸 धर्मारण्य वेदी: पितृ कर्म और श्राद्ध परंपरा का केंद्र। यहाँ साधु भोजन वंश और पितृ से जुड़े अदृश्य संबंधों को संतुलित करने का माध्यम माना जाता है।
🔸 पुरी तीर्थक्षेत्र: जगन्नाथ परंपरा का केंद्र। यहाँ अन्न सेवा अपार पुण्य संचित करती है।
🍛 33 मालपुआ संख्या का अर्थ
वैदिक परंपरा में 33 कोटि देवताओं का उल्लेख है। 33 मालपुआ अर्पित करना केवल संख्या नहीं, सम्पूर्ण देवत्व के प्रतीकात्मक तृप्तिकरण का भाव है।
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हाँ, चढ़ावा बुक करने के बाद आपको प्रमाणपत्र तुरंत उपलब्ध कराया जाएगा। आप अपनी बुकिंग के प्रमाणपत्र को 'चढ़ावा सेवा' पेज पर 'आपकी बुकिंग्स' में देख सकते हैं।
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