🐍✨ वर्ष में केवल एक बार ,जब नवरात्रि की पंचमी पर सर्पराज नाग वासुकी स्वयं जाग्रत होते हैं! शास्त्रों में कहा गया है "नागानां च पंचम्यां पूजनं मम प्रियम्।" अर्थात् पंचमी तिथि नाग देवताओं की सर्वाधिक प्रिय तिथि है। और जब यह पंचमी नवरात्रि में आती है जब आदिशक्ति स्वयं संपूर्ण शक्तियों के साथ जागृत होती हैं तब यह केवल एक तिथि नहीं रहती, यह एक महाशक्ति-संगम बन जाती है शक्ति और नाग-देवता का दिव्य मिलन।
🤔क्यों है यह अवसर वर्ष में केवल एक बार?
शारदीय नवरात्रि की पंचमी महातिथि एकमात्र तिथि है जब नवरात्रि का दिव्य शक्ति-काल एवं पंचमी का नाग - जागृति - काल एक साथ मिलते होते हैं। इस दिन नाग वासुकी के जाग्रत मंदिर में अर्पण और आदिशक्ति के 10 महाविद्या सिद्ध पीठ पर महाचढ़ावा दोनों मिलकर एक ऐसा कवच निर्मित करते हैं जो न काल सर्प दोष को शेष छोड़ता है, न नाग दोष को, न पितृ दोष को।
🐍सर्पराज नाग वासुकी और पंचमी का दिव्य वरदान:
पद्म पुराण की कथा है समुद्र मंथन में मंदराचल पर्वत की रस्सी बनकर जब नागवासुकी ने देवताओं और असुरों के लिए अमृत प्रदान किया, तब उनका सम्पूर्ण शरीर पर्वत के तीव्र घर्षण से क्षत-विक्षत हो गया। उस समय श्री हरि ने उन्हें प्रयाग में आकर विश्राम करने को कहा और तभी से यह मंदिर सर्प, नाग दोष शांति हेतु देश का सबसे जागृत तीर्थ माना गया है।
🔟10 महाविद्या पूजा नाग दोष का मूल-नाश कैसे करती है?
ज्योतिष में राहु को "सर्प का मुख" और केतु को "सर्प की पूंछ" कहा जाता है। काल सर्प दोष का निर्माण इन्हीं दोनों छाया ग्रहों के असंतुलन से होता है। 10 महाविद्याओं में छिन्नमस्ता महाविद्या राहु की अधिष्ठात्री देवी हैं और धूमावती महाविद्या केतु की। जब नवरात्रि की पंचमी पर इन 10 महाविद्याओं की एक साथ आराधना होती है, तब राहु और केतु काल सर्प दोष के दोनों मूल कारण एक ही अर्पण से शांत होते हैं।
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