






गरुड़ पुराण का स्पष्ट वचन है, पितर पितृलोक में "वायु-रूप" में रहते हैं और पितृ पक्ष में अपने वंशजों के पास आते हैं। पितरों का निवास चंद्रलोक में है और पितृपक्ष के समय वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों ही स्वरूपों में पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी सबसे कम होती है। पूर्णिमा को जब चंद्रमा पूर्ण होता है, पितर सर्वाधिक सक्रिय और ग्रहणशील होते हैं। यह श्रद्धा-विज्ञान है, जब एक वंशज नाम संकल्प लेकर अपने पूर्वज स्मरण करता है, तब उस आत्मा तक निमंत्रण पहुँचता है।
हर मनुष्य पाँच ऋणों के साथ जन्म लेता है। पितृ ऋण उनमें से सबसे बड़ा है। यदि इसे पितृ पक्ष में श्राद्ध-तर्पण से नहीं चुकाया जाता तो यह धीरे-धीरे "पितृ दोष" का रूप ले लेता है। कम या ज़्यादा, कुछ न कुछ पितृ ऋण सभी के जीवन में होता है। किन्तु नियमित पितृकार्य करने वाले परिवारों में यह दोष सक्रिय नहीं होता। जो परिवार कई पीढ़ियों से श्राद्ध नहीं कर रहे उनमें यह दोष प्रभावी हो जाता है।
हाँ बिल्कुल। यह एक सबसे बड़ी गलत धारणा है कि श्राद्ध केवल पुरुष कर सकते हैं। रामायण का प्रमाण: जब राम और लक्ष्मण सामग्री लेने गए, तब माता सीता ने अकेले फल्गु नदी के तट पर राजा दशरथ के लिए पिण्ड दान किया। यह श्राद्ध इतना शक्तिशाली था कि राम का संकल्प-पत्र गवाह बना।"ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्ता गोत्रविग्रहाः" इस श्लोक में स्पष्ट है कि पुत्र न हो तो भी पुत्री या कोई भी वंशज श्राद्ध कर सकता है।
हाँ! श्राद्ध केवल मृत माता-पिता के लिए नहीं दादा-दादी, नाना-नानी, परनाना-परदादा और कुल के किसी भी दिवंगत पूर्वज के लिए होता है। यदि सभी तीन पीढ़ियाँ जीवित हों, तब भी उनके पूर्वज (परदादा आदि) श्राद्ध की प्रतीक्षा में हो सकते हैं। पितृ पक्ष का संकल्प हमेशा "कुल के सभी पितरों के लिए" होता है।
कोई भी पितृकार्य तर्पण, और श्राद्ध वर्षभर किए जा सकते हैं, किन्तु पितृ पक्ष में इनका फल सहस्रों गुना अधिक होता है। कारण यह है कि इस पखवाड़े में पितर स्वयं पृथ्वी के निकट होते हैं, इसलिए अर्पण उन तक सीधे और तुरंत पहुँचता है। जैसे फोन करने और सामने बात करने में अंतर होता है वैसे ही पितृ पक्ष में श्राद्ध = सामने बात करना। मार्कण्डेय पुराण का वचन है कि पितृ पक्ष में किया गया तर्पण पितरों को वर्षभर तृप्त रखता है।
हाँ, शास्त्र में इसकी स्पष्ट आज्ञा है। गोकर्ण में श्राद्ध की सूची में गुरु, शिष्य, मित्र, ससुर, साले, मामा, भाई, बहन सभी शामिल हैं। "आत्मीय जन" जो आपके जीवन में प्रिय थे, जिनके जाने का दुख आपने उठाया उन सभी के लिए श्राद्ध किया जा सकता है। पितृ पक्ष में विशेष संकल्प में उनका नाम लें और उनकी आत्मा की शांति हेतु कार्य करें। प्रेम की कोई सीमा नहीं और श्राद्ध प्रेम का ही सर्वोच्च रूप है।
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क्योंकि तीनों पीढ़ियाँ तीन अलग-अलग लोकों में हैं और प्रत्येक लोक की अपनी भाषा है। बृहदारण्यक उपनिषद का शाश्वत वचन है - पिता वसु-रूप में, पितामह रुद्र-रूप में, प्रपितामह आदित्य-रूप में। तीन अलग दिव्य-लोक - तीन अलग पते। एक ही सामग्री से तीनों तक पहुँचने की कोशिश वैसी है - जैसे तीन अलग-अलग पतों पर एक ही भाषा में पत्र भेजना।
शास्त्रों में प्रत्येक हवन-काष्ठ एक विशेष देवता-शक्ति का वाहक है। पीपल (अश्वत्थ) - विष्णु-वृक्ष, जो वसु (जीवन-तत्त्व) से सम्बद्ध है और इस लोक-परलोक को जोड़ता है। शमी - शिव-वृक्ष, रुद्र-शक्ति का प्रतीक। महाभारत में पाण्डवों ने शमी-वृक्ष में ही अपने अस्त्र छुपाए थे। यह परिवर्तन और संचय का वृक्ष है। बिल्व (बेल) - सूर्य-वृक्ष, आदित्य-शक्ति का प्रतीक। बिल्व-पत्र शिव और सूर्य दोनों को अत्यन्त प्रिय है। सही काष्ठ, सही देवता-ही आपकी सेवा सही पितृ-लोक तक पहुँचा सकते है।
बुकिंग पूर्ण होते ही आपके पंजीकृत मोबाइल नम्बर पर तुरन्त डिजिटल प्रमाण-पत्र प्राप्त होगा। सेवा सम्पन्न होने के बाद - प्रत्येक स्थल का अलग वीडियो प्रमाण 24-48 घंटों के भीतर आपके फोन पर भेजा जाएगा। वीडियो में संकल्प-पाठ, तर्पण की अंजलियाँ और हवन-आहुति सम्मिलित होंगी।