महालया सर्व पितृ अमावस्या गजच्छाया योग गया 4 प्रहर पितृ मोक्ष प्राप्ति महासेवा
महालया सर्व पितृ अमावस्या गजच्छाया योग गया 4 प्रहर पितृ मोक्ष प्राप्ति महासेवा
महालया सर्व पितृ अमावस्या गजच्छाया योग गया 4 प्रहर पितृ मोक्ष प्राप्ति महासेवा
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महालया सर्व पितृ अमावस्या गजच्छाया योग गया 4 प्रहर पितृ मोक्ष प्राप्ति महासेवा

गजच्छाया योग - वह दुर्लभ खगोलीय संयोग - जब सूर्य और चन्द्रमा दोनों हस्त नक्षत्र में होते हैं और अमावस्या तिथि जब सभी पितृ दोबारा पितृलोक प्रस्थान करेंगे। इस दिन स्कन्द पुराण, अग्नि पुराण, मत्स्य पुराण, वराह पुराण और महाभारत - पाँचों ग्रंथों ने एकमत से घोषणा की है: इस योग में हर पितृ-कर्म = 5 गुना अधिक देता है और पितरों के लिए संपूर्ण मोक्ष द्वार खोलता है।
🐘इस गजच्छाया योग 'गज' का अर्थ है हाथी, सबसे विशाल, सबसे बलशाली, भगवान गणेश का स्वरूप। 'छाया' का अर्थ है छत्र-छाया - दिव्य सुरक्षा और अनुग्रह। गजच्छाया योग तब बनता है जब सूर्य और चंद्रमा दोनों हस्त नक्षत्र में हों और अमावस्या तिथि हो। हस्त नक्षत्र का अर्थ है 'हाथी की सूँड'। वह नक्षत्र जो ग्रहण, देने और संपर्क का प्रतीक है।
जब सूर्य (पिता, आत्मा का प्रतीक) और चंद्रमा (मन, पितृलोक का स्वामी) दोनों एक साथ उस 'हस्त' में हों, तब ब्रह्माण्ड का वह विशालतम दिव्य पात्र खुलता है जिसमें प्रत्येक पितृ-अर्पण का फल 'अक्षय' हो जाता है। मनुस्मृति और स्कंद पुराण - दोनों इस योग को श्राद्ध के लिए सर्वोत्तम काल घोषित करते हैं।
🛕 4 प्रहर = गरुड़ पुराण की सम्पूर्ण गया यात्रा - एक दिन में:
गरुड़ पुराण ने गया यात्रा का जो क्रम बताया है, फल्गु तट, फिर गद्याधर (विष्णुपद), फिर धर्मारण्य, फिर अक्षयवट - वह परम्परागत रूप से 5 से 7 दिनों में सम्पन्न होती है।इस महासेवा में गरुड़ पुराण का वह सम्पूर्ण क्रम गजच्छाया के एक ही दिन में चार प्रहरों में सम्पन्न होगा:
प्रथम प्रहर (6:15–9:15) तर्पण: गरुड़ पुराण - "गया पहुँचते ही सबसे पहले फल्गु में तर्पण। जो सीधे पितरों तक पहुँचती हैं।
द्वितीय प्रहर (9:15–12:15) सेवा: धर्मारण्य वेदी पर ब्राह्मण भोजन, स्कंद पुराण: जहाँ श्रीकृष्ण ने पांडवों का पितृ यज्ञ कराया और सभी के लिए मोक्ष के द्वार खोलें। ब्रह्माण्ड पुराण: "ब्राह्मण खाते हैं, पितर तृप्त होते हैं।"
तृतीय प्रहर (12:15–3:15) अर्पण: इस प्रहर में कुतुप मुहूर्त (11:44–12:32) और रोहिण मुहूर्त सम्मिलित हैं, इस समय विष्णु पद में अर्पण पितृ और मातृ दोनों पक्षों की 7 पीढ़ियों की मुक्ति सुनिश्चित करता है।
चतुर्थ प्रहर (3:15–6:15) दीपदान: गरुड़ पुराण: "अक्षयवट के नीचे दीपदान - समस्त पूर्वज और आने वाली पीढ़ियाँ पृथ्वी-बंधन से मुक्त।" माँ सीता का वरदान - अक्षयवट का पुण्य अक्षय है।
`🙏यह पितृ-सेवा का वह शिखर है जो एक जीवनकाल में एक बार मिलता है। अगली बार कब कोई नहीं जानता।
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