🪔✨श्री कृष्ण जन्मोत्सव जन्माष्टमी पर वहाँ अर्पण करें - जहाँ भगवान ने स्वयं देवकी माँ की इच्छा पर बाल-स्वरूप धारण कर विग्रह बनवाया था।
जब श्री कृष्ण द्वारका में राजसिंहासन पर विराजमान थे, तब देवकी माँ ने एक ही इच्छा व्यक्त की "पुत्र, जब तुम जन्मे थे, मैं कारागार में थी। जब तुम वृंदावन में माखन चुरा रहे थे, मैं बंदी थी। वह बाल-स्वरूप मथन-दण्ड और रस्सी वाला बच्चा वह मैंने कभी नहीं देखा। एक बार बस एक बार वह रूप दिखाओ।"
तब भगवान ने उस माँ की पीड़ा सुनी। उन्होंने वह बाल-स्वरूप धारण किया - मथन-दण्ड (मंथन की लाठी) और रस्सी हाथ में लेकर। श्री रुक्मिणी जी ने यह लीला देखी और भगवान से वही रूप की मूर्ति माँगी। भगवान ने स्वयं दिव्य शिल्पकार विश्वकर्मा को बुलाकर वह मूर्ति बनवाई और वही मूर्ति उडुपी में आज विराजमान है।
यह वह मंदिर है, जहां कृष्ण केवल प्रेम भाव को समझते और किसी अनुष्ठान को नहीं - जब कनकदास को मंदिर के अधिकारियों ने दर्शन देने से मना कर दिया तब वह मंदिर के पीछे जाकर भगवान का ध्यान करने करने लगे - और कृष्ण ने उनके प्रेम भाव को देखते हुए अपनी मुख्य प्रतिमा की दिशा कनकदास की तरफ़ कर दी - जिसके बाद कनकदास ने 9 छेद वाली खिड़की से कान्हा के बालस्वरूप के दर्शन किए।
🍚 उडुपी में अन्नदानम् सेवा - 800 वर्षों की अटूट परम्परा:
श्री माधवाचार्य जी ने उडुपी में एक सिद्धांत स्थापित किया:"अन्नदानम् ही पूजा है।" यहाँ परोसे जाने वाले भोजन को"अन्न ब्रह्म" कहते हैं - साक्षात् परब्रह्म का स्वरूप। 800 वर्षों में एक दिन भी यह परम्परा नहीं रुकी। गीता में भी कृष्ण ने कहा है -"अन्नाद् भवन्ति भूतानि।" वेद: "अन्न दानं समं दानं त्रिलोकेषु न विद्यते।" उडुपी के "अन्न ब्रह्म" में दिया गया अन्नदानम् पीढ़ियों के दोष नाश करता है, और पीढ़ियों तक साथ रखता है, यह बहु-पीढ़ी पुण्य है।
🙏 जन्माष्टमी वर्ष में एक बार आती है और ऐसे में दक्षिण द्वारका उडुपी में प्रेम भाव से भरें कृष्ण बाल स्वरूप को अर्पण करना और 800 साल पुरानी अन्न परंपरा से जुड़ना कोई साधारण योग नहीं है - आज ही अपने नाम से अर्पण हेतु नाम दर्ज करें।
इस सेवा में आप जो भी बुक करते हैं, वह केवल आपकी सेवा नहीं होती - आपकी भागीदारी हमें इस पुण्य कार्य को और अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करती है। यह योगदान किसी एक की नहीं, बल्कि एक सामूहिक सेवा का हिस्सा है।