महालया सर्व पितृ अमावस्या गजच्छाया योग अक्षय वट गया पितृ विसर्जन दीपदान
महालया सर्व पितृ अमावस्या गजच्छाया योग अक्षय वट गया पितृ विसर्जन दीपदान
महालया सर्व पितृ अमावस्या गजच्छाया योग अक्षय वट गया पितृ विसर्जन दीपदान
महालया सर्व पितृ अमावस्या गजच्छाया योग अक्षय वट गया पितृ विसर्जन दीपदान
महालया सर्व पितृ अमावस्या गजच्छाया योग अक्षय वट गया पितृ विसर्जन दीपदान
महालया सर्व पितृ अमावस्या गजच्छाया योग अक्षय वट गया पितृ विसर्जन दीपदान
महालया सर्व पितृ अमावस्या गजच्छाया योग अक्षय वट गया पितृ विसर्जन दीपदान
महालया सर्व पितृ अमावस्या गजच्छाया योग अक्षय वट गया पितृ विसर्जन दीपदान

महालया सर्व पितृ अमावस्या गजच्छाया योग अक्षय वट गया पितृ विसर्जन दीपदान

🪔✨ जब कोई प्रिय यात्रा पर जाता है, हम दरवाज़े पर दीप जलाते हैं - वह विदाई-दीप पितृ पक्ष की सर्वश्रेष्ठ तिथि पर आपके पितरों के लिए अक्षयवट, गया पर जलेगा। [1][2]
🐘60 साल में पहली बार - गजच्छाया योग की दिव्य छत्र-छाया में विदाई:
1966 के बाद पहली बार, 2026 में जब सूर्य और चंद्रमा दोनों हस्त नक्षत्र में हैं और महालया अमावस्या है - तब गजच्छाया योग बनता है। स्कंद पुराण का वचन: "गजच्छाया योग में जो अर्पित होता है, वह अनंत काल के लिए फलदायी होता है।" इसका अर्थ आज जो दीप जलाया जाएगा वह केवल आज का नहीं। वह दीप 12 वर्षों तक आपके पितरों के मोक्ष-पथ पर जलता रहेगा। 60 साल में मिलने वाले इस अवसर में विदाई का एक दीप उनके साथ अनंत काल तक जाता है।
🌳 अक्षयवट - वह अमर वृक्ष जो कभी नहीं बुझता:
जब माँ सीता ने फल्गु की बालू से पिंड बनाकर राजा दशरथ को अर्पित किया, तब चार साक्षियों में से केवल अक्षयवट ने सत्य बोला। माँ सीता ने उसे वरदान दिया: "तूने सत्य बोला, तू कभी नष्ट नहीं होगा।" वह वृक्ष आज भी उसी स्थान पर खड़ा है, हज़ारों वर्षों बाद भी। जो वृक्ष स्वयं कभी नहीं बुझता उसके तले जलाया दीप भी कभी नहीं बुझता।'अक्षयवट का दीप' = 'अक्षय दीप' — अमर वृक्ष के तले जला, अमर प्रकाश पितरों के साथ पितृ-लोक तक जाता है।
🕯️ गरुड़ पुराण और महाभारत - दीप पितरों का मार्गदर्शक है:
गरुड़ पुराण: "मृत्यु के पश्चात् आत्मा अंधकार में भटकती है। उनके नाम से जलाया दीप उन्हें प्रकाश और शांति देता है। जब कोई वंशज पितर के नाम से दीप जलाता है, वह दीप उस आत्मा के मार्ग को प्रकाशित करता है, उसे मोक्ष की ओर गति मिलती है।" महाभारत में वर्णित है: कुरुक्षेत्र के महायुद्ध के पश्चात् पांडवों ने मृत सैनिकों के लिए 'आकाश दीप' जलाए - यह हिन्दू परम्परा का पहला प्रमाणित पितृ-दीपदान है। सहस्रों वर्षों से यह परम्परा चली आई है आज गजच्छाया योग में अक्षयवट पर आप उसी परम्परा को आगे बढ़ाते हैं।
🛕 श्री मंदिर ऐप से घर बैठे - गजच्छाया प्रदोष काल में अक्षयवट दीप:
10 अक्टूबर 2026 को गया जाना, अक्षयवट तक पहुँचना, प्रदोष काल में वहाँ उपस्थित रहकर दीप जलाना यह अधिकांश परिवारों के लिए असंभव है। किन्तु श्री मंदिर ऐप के माध्यम से आप घर बैठे आपके पितरों के लिए गजच्छाया के अंतिम प्रहर में गया के प्रमाणित गयावाल पुरोहित अक्षयवट के तले पितृ विसर्जन दीप प्रज्वलन सम्पूर्ण विधि-विधान से सम्पन्न कराएंगे। वीडियो प्रमाण 24-48 घंटों में प्राप्त होगा।
जो तीनों लोकों में प्रकाश पहुँचाता है, पितृ विसर्जन काल में वहाँ दीप जलायें - अक्षयवट गया पितृ विसर्जन दीप प्रज्वलन में अभी बुक करें!
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