🏔️✨ गोवर्धन पूजा महापर्व - "गोवर्धनोऽहमस्मि!" जब कान्हा ने स्वयं कहा: 'मैं ही गोवर्धन पर्वत हूँ!'
श्रीमद् भागवत के दशम स्कंध में वह क्षण अमर हो गया जब ब्रजवासियों ने पहली बार इंद्र को नहीं, गिरिराज गोवर्धन को अन्नकूट अर्पित किया। और उसी पल श्री कृष्ण ने एक विशाल दिव्य रूप धारण किया, पर्वत के ऊपर प्रकट हुए और घोषणा की 'शैलोऽस्मि!' "मैं ही यह पर्वत हूँ!" और उन्होंने समस्त अन्नकूट का भोग स्वयं ग्रहण किया। उस दिन से आज तक गोवर्धन पर्वत श्री कृष्ण का स्वयं-घोषित स्वरूप है। यहाँ अर्पित प्रत्येक भोजन साक्षात कान्हा को ही प्राप्त होता है।
🏔️ 'दो स्वरूप, एक कान्हा' क्यों है यह सेवा अद्वितीय?
इस कैम्पेन में एक साथ दो पावन स्थानों पर चढ़ावा अर्पित होगा:
पहला श्री स्नेह बिहारी बांके बिहारी मंदिर, वृन्दावन जहाँ ठाकुर जी का दिव्य विग्रह स्वयं एक गौशाला की भूमि से प्रकट हुआ था। यह मंदिर गोशाला, गोवर्धन और गोपाल तीनों की एकता का जीवंत प्रमाण है। यहाँ कान्हा के विग्रह-स्वरूप को अन्नकूट भोग अर्पित करना उन्हें उनके प्रिय वृन्दावन में तृप्त करना है।
दूसरा गिरिराज गोवर्धन पर्वत, जहाँ स्वयं भागवत ने कहा है कि गिरिराज कृष्ण से अभिन्न हैं। यहाँ अर्पित चढ़ावा किसी प्रतीक को नहीं, स्वयं उस पर्वत-रूपी कान्हा को मिलता है जो आज भी इस शिला में जागृत हैं।दोनों स्थानों पर कान्हा के दोनों स्वरूपों का एक साथ दर्शन और अर्पण यह सम्पूर्ण कृष्ण-आराधना है।
🛕 श्री मंदिर ऐप से घर बैठे दोनों पावन स्थानों पर एक साथ चढ़ावा अर्पित करें:
एक ही दिन में वृन्दावन के श्री स्नेह बिहारी बांके बिहारी मंदिर और गोवर्धन पर्वत दोनों स्थानों पर जाकर चढ़ावा चढ़ाना किसी भी व्यक्ति के लिए असंभव है। किन्तु श्री मंदिर ऐप के माध्यम से आप घर बैठे दोनों पावन स्थानों पर अपने नाम से यह सम्पूर्ण अन्नकूट चढ़ावा करवा सकते हैं। प्रत्येक स्थान के प्रमाणित वैदिक पुरोहित सम्पूर्ण विधि-विधान से चढ़ावा-भोग अर्पण सम्पन्न कराएंगे। वीडियो प्रमाण 24-48 घंटों में प्राप्त होगा।
🙏 कार्तिक मास में दिवाली के ठीक अगले प्रभात उस एकमात्र दिन जब गिरिधर ने स्वयं 'मैं ही गोवर्धन हूँ' कहकर भक्तों का भोग ग्रहण किया था उस गिरिराज को आप अन्नकूट स्वरूप प्रेम-व्यंजन अर्पित करें। यह अवसर वर्ष में केवल एक बार आता है अभी बुक करें!