
क्या आप जानते हैं ज्येष्ठ अमावस्या पर किए गए ये उपाय क्यों माने जाते हैं सबसे प्रभावी? जानें पूजा तिथि, विधि और रहस्य।
ज्येष्ठ अमावस्या हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास की अंतिम तिथि होती है। इस दिन पितरों के लिए तर्पण, दान और स्नान का विशेष महत्व होता है। यह पवित्र दिन आध्यात्मिक शुद्धि और पुण्य अर्जन का प्रतीक माना जाता है। आइये जानते हैं इसके बारे में...
सनातन धर्म में स्नान-दान व पितरों के निमित्त तर्पण करने के लिए अमावस्या तिथि को श्रेष्ठ माना गया है। इनमें से ज्येष्ठ मास में पड़ने वाली अमावस्या तिथि का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि इस तिथि पर शनि जयंती भी मनाई जाती है।
पुराणों में वर्णन मिलता है कि ज्येष्ठ अमावस्या के दिन ही शनि देव का जन्म हुआ था, इसलिए ज्येष्ठ अमावस्या धार्मिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। शनि देव सूर्य पुत्र माने जाते हैं, और वो नवग्रहों में से एक हैं। शनि के प्रकोप से बचने व उनकी कृपा पाने के लिए जातक इस दिन विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। शनि देव को दण्डाधिकारी और न्याय का देवता माना जाता है। उन्हें कलयुग का न्यायाधीश भी कहा जाता है। शनि देव संसार के समस्त जीवों को उनके कर्मों के आधार पर फल प्रदान करते हैं। उनकी चलने की गति मंद होने के कारण उन्हें शनैश्चर भी कहा जाता है।
ज्येष्ठ अमावस्या के अवसर पर स्नान-दान व पिंडदान के साथ-साथ शनि देव की उपासना की जाती है और वट सावित्री व्रत भी किया जाता है। इस दिन होने वाले धार्मिक अनुष्ठान इस प्रकार हैं-
शनि देव के जन्म से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार शनि देव, भगवान सूर्य व उनकी पत्नी छाया के पुत्र हैं। सूर्य का विवाह संज्ञा से हुआ था, जिनसे मनु, यम एवं यमुना नामक तीन संतानें हुईं। विवाह के पश्चात् कुछ समय तक संज्ञा भगवान सूर्य के साथ रहीं, परंतु अधिक समय तक सूर्य का तेज सहन न कर पाने के कारण उन्होंने अपनी छाया को उनकी सेवा के लिए समर्पित कर दिया। इसके कुछ समय पश्चात् छाया के गर्भ से शनि देव का प्रादुर्भाव हुआ। हालांकि जब सूर्य देव को ज्ञात हुआ कि छाया वास्तव में संज्ञा नहीं हैं, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने शनि को अपने पुत्र के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इसी कारण शनि व सूर्य पिता-पुत्र होने पर भी एक-दूसरे के प्रति बैर की भावना रखने लगे।
ज्येष्ठ अमावस्या पर शनि जयंती के अलावा उत्तर भारत में स्त्रियां अपने पति के दीर्घायु होने के लिये इस दिन वट सावित्री व्रत का पालन करती हैं। विशेष रूप से सौभाग्यवती स्त्रियां इस पर्व को मनाती हैं, हालांकि ये व्रत कुमारी व विधवा स्त्रियां भी कर सकती हैं। इस दिन स्त्रियां वट अर्थात् बरगद के वृक्ष की पूजा की जाती है। साथ वट सावित्री व्रत के समय यमराज व सत्यवान- सावित्री की भी पूजा करने का विधान है। मान्यता है कि ऐसा करने वाली स्त्रियां सदा सौभाग्यवती रहती हैं।
तो भक्तों ये तो थी ज्येष्ठ अमावस्या से जुड़ी संपूर्ण जानकारी। हमारी कामना है कि इस अवसर पर आपकी आराधना सफल हो और आप पर शनिदेव की कृपा सदैव बनी रहे। ऐसे ही व्रत, त्यौहार व अन्य धार्मिक जानकारियों के लिए जुड़े रहिए श्री मंदिर पर।
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