
जानें 2025 में दूर्वा अष्टमी की तिथि, पूजा का महत्व, व्रत की कथा और भगवान गणेश को प्रसन्न करने की विधि, जिससे जीवन में सुख, समृद्धि और विघ्नों का नाश हो।
दूर्वा अष्टमी हर साल श्रावण मास की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। यह व्रत दूर्वा घास की पूजा करके सुख, समृद्धि और परिवार की रक्षा के लिए किया जाता है। दूर्वा को भगवान शिव का प्रिय माना जाता है।
हिंदू धर्म में ऐसे कई व्रतों का निष्ठापूर्वक पालन किया जाता है, जिनकी कथा भगवान विष्णु से जुड़ी हुई है। ऐसा ही एक व्रत है, दूर्वा अष्टमी का व्रत, जिसे भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाता है। यह व्रत मुख्यतः स्त्रियों द्वारा ही रखा जाता है। तो चलिए आज आपको इस व्रत की सम्पूर्ण जानकारी से अवगत कराते हैं।
मुहूर्त | समय |
ब्रह्म मुहूर्त | 04:08 ए एम से 04:53 ए एम तक |
प्रातः सन्ध्या | 04:30 ए एम से 05:38 ए एम तक |
अभिजित मुहूर्त | 11:33 ए एम से 12:23 पी एम तक |
विजय मुहूर्त | 02:05 पी एम से 02:55 पी एम तक |
गोधूलि मुहूर्त | 06:18 पी एम से 06:41 पी एम तक |
सायाह्न सन्ध्या | 06:18 पी एम से 07:26 पी एम तक |
अमृत काल | 05:49 ए एम से 07:37 ए एम तक |
निशिता मुहूर्त | 11:36 पी एम से 12:21 ए एम, सितम्बर 01 तक |
दूर्वा अष्टमी एक विशेष धार्मिक पर्व है, जो भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन पवित्र दूर्वा घास की पूजा की जाती है, जो देवी-देवताओं के पूजन में अत्यंत शुभ और आवश्यक मानी जाती है। दूर्वा अष्टमी व्रत मुख्यतः भगवान विष्णु और श्रीगणेश जी को समर्पित होता है।
इस दिन श्रद्धालु उपवास रखते हैं, दूर्वा घास एकत्र करते हैं और उसका पूजन कर जीवन में सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना करते हैं। इस दिन की गई पूजा से घर-परिवार में नकारात्मकता का नाश होता है और लक्ष्मी-नारायण की कृपा प्राप्त होती है।
हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार (कछुए का रूप) धारण कर मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर संभाला था। मंथन के दौरान पर्वत के तीव्र घर्षण से, भगवान विष्णु के शरीर से कुछ रोम (बाल) समुद्र में गिर पड़े। जब अमृत की कुछ बूंदें उन रोमों पर पड़ीं, तो वे दूर्वा घास के रूप में इस पृथ्वी पर उत्पन्न हो गईं। इस कारण, दूर्वा को श्रीहरि विष्णु के शरीर का अंश और अत्यंत पवित्र माना गया है। यही कारण है कि दूर्वा अष्टमी पर विशेष रूप से दूर्वा घास की पूजा की जाती है।
दूर्वा अष्टमी का पर्व पूरी श्रद्धा और नियम से मनाया जाता है। इस दिन सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लिया जाता है और दिनभर उपवास रखा जाता है। पूजा मुख्यतः दोपहर के समय या शुभ मुहूर्त में की जाती है। पूजा का क्रम इस प्रकार है:
दूर्वा अष्टमी के दिन मुख्य रूप से इन देवताओं की पूजा की जाती है:
साथ ही, दूर्वा घास की भी पूजा की जाती है, उसे पूजा में देवी के रूप में प्रतिष्ठित कर अर्पण किया जाता है।
दूर्वा अष्टमी व्रत के लिए आवश्यक पूजन सामग्री इस प्रकार है:
दूर्वा दो शब्दों, ‘दुहु’ और ‘अवम’ के मेल से बना है। इसे हिंदू धर्म की पूजा-अर्चनाओं में अत्यंत पवित्र स्थान दिया गया है। तभी तो कोई भी मंगल कर्म, दूर्वा घास के बिना पूरा नहीं होता है। दूर्वा अष्टमी का व्रत विशेषतः महिलाओं में बड़ा प्रचलित है। इस दिन महिलाएं, सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान कर, व्रत का संकल्प लेती हैं, नए वस्त्र धारण करती हैं। इसके बाद दही, फूल,फल, अगरबत्ती समेत सभी पूजन सामग्रियों से दूर्वा की पूजा की जाती है।
इसके पश्चात भगवान गणेश, शिव जी और माता पार्वती को दूर्वा चढ़ा कर, इनकी पूजा की जाती है। इस दिन भगवान गणेश को तिल और मीठे आटे से बनी रोटी का भोग भी लगाया जाता है। साथ ही, ब्राह्मणों को नए वस्त्र और भोजन का भी दान दिया जाता है। दूर्वा घास के पूजन के लिए, विशेष परिश्रम की भी आवश्यकता नहीं होती। इसे घर के आँगन में ही लगाया जाता है। यह एक तरह से, आध्यात्मिकता को परिवेश के साथ सहेजकर रखने का प्रतीक भी होती है।
दूर्वा अष्टमी व्रत और पूजा करने से अनेक आध्यात्मिक व सांसारिक लाभ मिलते हैं, जैसे:
व्रत के दिन अधिकतर लोग फलाहार करते हैं, यहाँ कुछ उपयुक्त विकल्प दिए जा रहे हैं:
ऐसी मान्यता है, कि दूर्वा अष्टमी के व्रत को पूरी श्रद्धा से करने पर, भक्तों की सभी मनोकामना पूरी होती है। दूर्वा घास की दिव्यता का अपना एक उज्जवल इतिहास वर्णित है। मान्यता है, कि भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को दूर्वा घास का महत्व बताया था। वहीं माता सीता ने भी लंका में इसी दूर्वा घास के द्वारा, रावण से दूरी बनाई और रावण को भी इसे ना लांघने की चेतावनी दी थी।
तो ये थी, दूर्वा अष्टमी के व्रत की विस्तृत जानकारी। उम्मीद करते हैं, आपको यह जानकारी अच्छी लगी। हिंदू धर्म के ऐसे अन्य व्रतों और पर्वों की विस्तृत जानकारी से अवगत होने के लिए, आप श्रीमंदिर के साथ जुड़े रहें।
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