
जानिए पोंगल के लिए सुंदर और आसान मुग्गलू/कोलम डिज़ाइन, पारंपरिक और आधुनिक आइडियाज और सजावट के तरीके।
पोंगल मुग्गुलु दक्षिण भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है। पोंगल के अवसर पर इसे खास महत्व दिया जाता है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी लोगों की आस्था और परंपरा को दर्शाती है। तो चलिए जानते हैं आखिर क्या है पोंगल मुग्गुलु।
सबसे पहले मुग्गुलु शब्द का अर्थ जानना जरूरी है। जानकारी के अनुसार, मुग्गुलु का अर्थ ज़मीन पर बनाए जाने वाले शुभ चित्रों से है। पोंगल मुग्गुलु का सीधा संबंध समृद्धि, स्वागत और खुशहाली से जुड़ा हुआ है। दक्षिण भारत में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इसे मुग्गुलु, तमिलनाडु में कोलम और केरल में कोलम या पूक्कलम कहा जाता है।
कई स्थानों पर इसे रंगोली के नाम से भी पहचाना जाता है। पोंगल मुग्गुलु दक्षिण भारत की एक पारंपरिक कला है, जिसे विशेष रूप से पोंगल या मकर संक्रांति के अवसर पर बनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि घर के मुख्य द्वार या आंगन में मुग्गुलु बनाने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है और नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं। यही कारण है कि त्योहारों के समय इसे विशेष महत्व दिया जाता है। पारंपरिक रूप से पोंगल मुग्गुलु चावल के आटे से बनाई जाती है, जो प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक मानी जाती है, क्योंकि चावल फसल और समृद्धि का संकेत होता है।
यह रंगोली घर के मुख्य द्वार, आंगन या सामने की खुली जगह पर चावल के आटे, खड़िया, रंगीन पाउडर या फूलों की मदद से बनाई जाती है। पोंगल मुग्गुलु केवल घर की सजावट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दक्षिण भारतीय समाज में परंपरा, आस्था और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है।
पोंगल मुग्गुलु का धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व है। यह सूर्य देव, धरती माता और प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने का माध्यम है। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की महिलाएं इसे सम्मान, स्वागत और मेहमाननवाज़ी का प्रतीक मानती हैं। ऐसा माना जाता है कि मुग्गुलु बनाने से घर में सौभाग्य, समृद्धि और शांति बनी रहती है। यही कारण है कि कई घरों में इसे रोज़ाना भी बनाया जाता है, खासकर त्योहारों के समय भी।
मुग्गुलु की परंपरा बहुत प्राचीन मानी जाती है। जानकारी के अनुसार, इसकी शुरुआत सिंधु घाटी सभ्यता से हुई थी। धार्मिक ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। ऋषि वात्स्यायन द्वारा वर्णित 64 कलाओं में कोलम कला का वर्णन मिलता है। कुछ कथाओं में यह भी कहा गया है कि गोपियां भगवान कृष्ण को याद करते हुए कोलम बनाया करती थीं। समय के साथ यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही और यह आज भी जीवित है।
पोंगल के चारों दिनों में मुग्गुलु बनाई जाती है, लेकिन भोगी पोंगल और मट्टू पोंगल के दिन इसका विशेष महत्व होता है। मट्टू पोंगल के दिन गायों और बैलों के सम्मान में बनाए जाने वाले मुग्गुलु में पशुओं, गन्ने और पोंगल के बर्तन के चित्र प्रमुख होते हैं।
पोंगल मुग्गुलु कई प्रकार की होती है। सरल कोलम से लेकर जटिल बिंदु वाली कोलम तक इसके अनेक रूप हैं। कुछ कोलम केवल बिंदुओं को जोड़कर बनाई जाती हैं, जबकि कुछ में बिंदुओं के चारों ओर घुमावदार रेखाएं बनाई जाती हैं, जिन्हें इडुक्कु पुल्ली कहा जाता है। मट्टू पोंगल के दिन मवेशियों से जुड़े चित्रों वाली कोलम बनाई जाती है।
पारंपरिक रूप से मुग्गुलु सूखे चावल के आटे से बनाई जाती है। इसके अलावा आजकल रंगीन चावल पाउडर, खड़िया, चॉक, रंगीन रेत और फूलों का भी उपयोग किया जाता है।
पोंगल मुग्गुलु के प्रमुख डिजाइन
गन्ने के चित्र
पोंगल का बर्तन
सूर्य देव के चित्र
कमल, मोर और गाय के चित्र
ज्यामितीय पैटर्न (गोल, चौकोर और हीरे के आकार)
दीयों का उपयोग, जिससे मुग्गुलु अधिक आकर्षक लगती है
भगवान गणेश के चित्र वाली मुग्गुलु, जो शुभ मानी जाती है
आधुनिक समय में मुग्गुलु की परंपरा
फ्लैट संस्कृति के कारण मुग्गुलु बनाने की परंपरा में बदलाव आया है।
समय की कमी के कारण कई लोग मुग्गुलु स्टिकर का उपयोग करने लगे हैं।
Did you like this article?

Pongal quotes खोज रहे हैं? जानिए पोंगल के लिए बेस्ट शुभकामना कोट्स, संदेश और विचार जो आप परिवार और दोस्तों के साथ शेयर कर सकते हैं।

Jallikattu क्या है और कहां होता है? जानिए जल्लीकट्टू का इतिहास, महत्व, प्रक्रिया और यह तमिलनाडु में क्यों और कैसे मनाया जाता है।

Pongal holidays 2026 कब हैं? जानिए 2026 में पोंगल की छुट्टियों की तारीखें, कितने दिन की छुट्टी होती है और कहां मनाई जाती हैं।