
जानिए 4 दिन तक चलने वाले पोंगल पर्व की पूजा विधि, भोग, कोलम और सूर्य देव की खास परंपराएं।
पोंगल दक्षिण भारत का प्रमुख फसल पर्व है, जो सूर्य देव, प्रकृति और अन्न के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है। यह पर्व नई फसल की खुशी और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस लेख में जानिए पोंगल पर्व का महत्व, परंपराएंं, धार्मिक मान्यताएं एवं इस पर्व को मनाने का तरीका।
पोंगल भारत के प्रमुख फसल पर्वों में से एक है, जिसे विशेष रूप से तमिलनाडु में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह चार दिनों तक चलने वाला पारंपरिक उत्सव है, जो तमिल कैलेंडर के थाई महीने में आता है और सामान्यतः 14 जनवरी के आसपास मनाया जाता है, इसलिए इसे थाई पोंगल कहा जाता है। पोंगल का अर्थ है “उफनना” या “उबाल आना”, जो नई फसल से बने मीठे पोंगल व्यंजन और समृद्धि का प्रतीक है। इस पर्व के दौरान सूर्य देव, प्रकृति, पशु और धरती माता के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है।
वर्ष 2026 में पोंगल का पर्व बुधवार, 14 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा। इसी दिन थाई पोंगल संक्रांति का शुभ क्षण दोपहर 03:13 बजे रहेगा। इसके साथ ही मकर संक्रांति भी बुधवार, 14 जनवरी 2026 को ही मनाई जाएगी। यह समय पोंगल पर्व के अनुष्ठानों, पूजा और शुभ कार्यों के लिए विशेष रूप से मंगलकारी माना जाता है।
पोंगल का महत्व
पोंगल केवल एक फसल उत्सव नहीं, बल्कि तमिल संस्कृति, कृषि परंपरा और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का पावन पर्व है। इसका इतिहास संगम काल तक जाता है, जिससे यह द्रविड़ सभ्यता का प्राचीनतम फसल पर्व माना जाता है। कृषि प्रधान भारत में पोंगल का विशेष स्थान है, क्योंकि यह किसानों की मेहनत, धैर्य और प्रकृति के सहयोग का उत्सव है। इस पर्व पर सूर्य देव और इंद्र देव की आराधना कर अच्छी वर्षा और समृद्ध फसल के लिए धन्यवाद दिया जाता है। भोगी पोंगल के माध्यम से पुराने और नकारात्मक तत्वों का त्याग कर नए जीवन, नई ऊर्जा और आशा का स्वागत किया जाता है।
पोंगल हिंदू धर्म का एक प्रमुख और अत्यंत शुभ पर्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन देवताओं के जागने का समय होता है, जो छह महीने की रात्रि के बाद नए प्रकाश और नई शुरुआत का संकेत देता है। इसी कारण पोंगल को जीवन में नए आरंभ और आशा का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व चार दिनों तक मनाया जाता है और हर दिन का अपना अलग महत्व होता है। पोंगल के प्रत्येक दिन अलग-अलग रीति-रिवाज और परंपराएँ निभाई जाती हैं।
पहला दिन: भोगी पोंगल
इस दिन किसान अपने खेतों में पूजा करते हैं और नई फसल के लिए पृथ्वी माता व सूर्य देव के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। खेती के औजारों जैसे हंसिया और हल पर चंदन लगाया जाता है और अच्छी उपज के लिए प्रार्थना की जाती है।
दूसरा दिन: सूर्य पोंगल
यह दिन सूर्य देव को समर्पित होता है। घरों में दूध, गुड़ और चावल से बना पवित्र व्यंजन ‘पोंगल’ पकाया जाता है, जिसे सूर्य देव को अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
तीसरा दिन: मट्टू पोंगल
इस दिन गाय-बैल जैसे पशुधन की पूजा की जाती है, क्योंकि वे कृषि में सहायक होते हैं। पशुओं को स्नान कराया जाता है, उनके सींगों को रंगों से सजाया जाता है और फूलों की मालाएँ पहनाई जाती हैं। पूजा के बाद उन्हें स्वादिष्ट भोजन खिलाया जाता है।
चौथा दिन: काणुम पोंगल
पर्व का अंतिम दिन खुशियाँ मनाने और विश्राम का होता है। लोग परिवार और मित्रों के साथ समय बिताते हैं। इस दिन को विवाह संबंध तय करने के लिए भी शुभ माना जाता है।
भारत एक कृषि प्रधान देश है, इसलिए पोंगल जैसे फसल उत्सव को देश के अलग-अलग भागों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। हालाँकि इन त्योहारों के नाम अलग-अलग हैं, लेकिन इनके पीछे की भावना और उद्देश्य एक ही है, अच्छी फसल के लिए प्रकृति का धन्यवाद करना।
उत्तर भारत में मकर संक्रांति
पंजाब में लोहड़ी
असम में भोगाली बिहू
महाराष्ट्र में हडगा उत्सव
बंगाल में पौष संक्रांति
गुजरात में उत्तरायण
इस प्रकार पोंगल केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, परिश्रम और कृतज्ञता का उत्सव है। यह त्योहार हमें सूर्य, धरती और पशुधन के महत्व को समझाता है, जिनके बिना जीवन और कृषि की कल्पना संभव नहीं है। पोंगल आपसी प्रेम, पारिवारिक एकता और नई शुरुआत का संदेश देता है। परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ा यह पर्व हमें सिखाता है कि आभार व्यक्त करना और मिल-जुलकर खुशियाँ मनाना ही सच्ची समृद्धि है। इन बातों का ध्यान रखकर यह पर्व और भी मंगलमय बनता है।
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