द्वापर युग कब है
image
downloadDownload
shareShare
ShareWhatsApp

द्वापर युग कब है?

क्या आप जानना चाहते हैं कि द्वापर युग कब था और इसका अंत कैसे हुआ? इस लेख में आपको द्वापर युग की अवधि, उससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं, प्रमुख घटनाएं और कलियुग के प्रारंभ की पूरी जानकारी सरल भाषा में मिलेगी।

द्वापर युग के बारे में

द्वापर युग हिंदू धर्म के चार युगों में तीसरा युग माना जाता है, जो सतयुग और त्रेतायुग के बाद तथा कलियुग से पहले आता है। 2025 के संदर्भ में कुछ लोग मानते हैं कि मानवता आध्यात्मिक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है, इसलिए द्वापर युग की चर्चा बढ़ रही है। हालांकि पारंपरिक मान्यता के अनुसार वर्तमान समय कलियुग ही है, लेकिन जागरूकता और चेतना का विस्तार द्वापर जैसी ऊर्जा का संकेत माना जाता है।

द्वापर युग

द्वापर युग हिंदू मान्यता के अनुसार चार युगों में तीसरा युग है। इसका आरंभ भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी, गुरुवार के दिन माना गया है। पुराणों के अनुसार इस युग की अवधि लगभग आठ लाख चौसठ हज़ार वर्ष बताई गई है। द्वापर युग को ‘वैश्य युग’ भी कहा जाता है, जिसमें कर्म, युद्ध और संघर्ष का विशेष महत्व रहा।

यह युग मुख्य रूप से महाभारत काल और भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ा हुआ है। इसी समय धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष अपने चरम पर था। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने उपदेशों और कर्मों के माध्यम से मानवता को धर्म, नीति और आध्यात्म का मार्ग दिखाया। अंततः इस युग में अधर्म पर धर्म की विजय हुई, जिससे समाज को सही दिशा मिली।

द्वापर युग कब शुरू हुआ और कब समाप्त हुआ?

द्वापर युग माघ माह की कृष्ण अमावस्या से आरंभ हुआ था। इस काल में मनुष्य की औसत आयु लगभग 1000 वर्ष बताई गई है। द्वापर युग का प्रमुख तीर्थ कुरुक्षेत्र माना जाता है, जहाँ धर्म और अधर्म के बीच महान युद्ध हुआ। इसी युग में भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर जन्म लिया और कंस जैसे दुष्टों का संहार कर धर्म की स्थापना की। शास्त्रों के अनुसार, द्वापर युग की अवधि पूरी होने के बाद कलियुग का आरंभ हुआ।

द्वापर युग कितने वर्षों का था?

हिंदू शास्त्रों और पुराणों के अनुसार द्वापर युग की कुल अवधि लगभग 8 लाख 64 हजार वर्ष (8,64,000 वर्ष) मानी गई है। यह चार युगों मे —सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग में तीसरा युग था। इस युग में धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष अपने चरम पर था।

द्वापर युग का धार्मिक महत्व

द्वापर युग का धार्मिक महत्व बहुत गहरा और व्यापक माना जाता है। यह वह युग था जब धर्म और अधर्म के बीच संतुलन बना हुआ था, लेकिन नैतिक संघर्ष लगातार बढ़ रहे थे। सतयुग की पूर्ण धार्मिकता इस समय कम होने लगी और मनुष्य को सही-गलत के बीच चुनाव करना सीखना पड़ा। इसी कारण द्वापर युग में धर्म की समझ और उसका पालन अधिक महत्वपूर्ण हो गया।

इस युग का सबसे बड़ा धार्मिक आधार भगवान श्रीकृष्ण का अवतार है। उन्होंने अपने जीवन और कर्मों के माध्यम से यह सिखाया कि धर्म केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि कर्तव्य, सत्य और न्याय का मार्ग है। भगवद् गीता में दिए गए उनके उपदेश आज भी मानव जीवन को सही दिशा दिखाते हैं और कर्मयोग, भक्ति तथा ज्ञान का महत्व समझाते हैं। द्वापर युग हमें यह भी सिखाता है कि ईश्वर से जुड़ाव और भक्ति के बिना जीवन अधूरा है।

द्वापर युग का पौराणिक कारण

हिंदू पुराणों के अनुसार द्वापर युग का आरंभ त्रेतायुग के अंत में धर्म की शक्ति कम होने के कारण हुआ। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, मनुष्य की सत्यनिष्ठा, तप, संयम और धर्म के प्रति आस्था घटने लगी। त्रेतायुग में जहाँ धर्म तीन चरणों में स्थित था, वहीं द्वापर युग में वह घटकर दो चरणों पर टिक गया, इसलिए इस युग में धर्म और अधर्म का संतुलन लगभग बराबर हो गया।

पौराणिक कथाओं के अनुसार मनुष्य में अहंकार, मोह, लालच और प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी। लोग भौतिक सुखों की ओर अधिक आकर्षित हो गए और सत्य का पालन कम होने लगा। इसी कारण समाज में अशांति, संघर्ष और युद्ध बढ़े। धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए भगवान विष्णु ने इस युग में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। महाभारत युद्ध और भगवद् गीता का उपदेश द्वापर युग के पौराणिक कारण और उद्देश्य को स्पष्ट करता है, जहाँ भगवान ने कर्म, भक्ति और धर्म के सही मार्ग की स्थापना की।

द्वापर युग में जीवन कैसा था?

  • द्वापर युग को कांस्य युग भी कहा जाता है। इस युग में मानव जीवन में भौतिक सुख बढ़े, लेकिन नैतिकता में गिरावट भी देखने को मिली। धर्म और अधर्म का संतुलन लगभग बराबर माना गया। द्वापर युग का जीवन कई विशेषताओं से भरा हुआ था।
  • इस युग में लोगों की धार्मिक भावना कमजोर होने लगी थी। सत्य का पालन कम होता गया और मोह, भ्रम तथा अधर्म बढ़ने लगे। ईश्वर से दूरी महसूस की जाने लगी।
  • लोग अधिक महत्वाकांक्षी, प्रतिस्पर्धी और सुख-सुविधाओं के प्रति आकर्षित थे। यज्ञ, दान और धार्मिक अनुष्ठानों का प्रचलन था, लेकिन साथ ही भौतिक सुख भी बढ़ा।
  • इस युग में लोग शारीरिक रोगों और मानसिक तनाव से ग्रस्त रहते थे। पाप बोध के कारण प्रायश्चित करने की परंपरा भी प्रचलित थी।
  • राजा अहंकार से शासन करते थे। सत्ता और संसाधनों के लिए संघर्ष और युद्ध आम थे। महाभारत का कुरुक्षेत्र युद्ध इसका प्रमुख उदाहरण है।
  • इसी युग में वेदों को चार भागों में विभाजित किया गया। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश देकर कर्म और धर्म का ज्ञान दिया।
  • अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ। युग के अंत तक अधर्म और भ्रष्टाचार बढ़ गया, जिससे भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेकर धर्म की स्थापना की।

द्वापर युग और कलियुग में अंतर

हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार द्वापर युग और कलियुग के बीच जीवन, धर्म और समाज में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। इन दोनों युगों का अंतर निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता हैं।

धर्म की स्थिति - द्वापर युग में धर्म और अधर्म का संतुलन बना हुआ था। कुछ धर्मात्मा राजा न्याय और सद्गुणों की रक्षा करते थे। वहीं कलियुग में धर्म कमजोर हो गया और अधर्म का प्रभाव अधिक बढ़ गया है।

भगवान का अवतार - द्वापर युग में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेकर अधर्म का नाश किया और धर्म की स्थापना की। कलियुग में भगवान का प्रत्यक्ष अवतार नहीं है, बल्कि भक्ति और नाम-स्मरण को मुक्ति का मार्ग बताया गया है।

समाज और शासन - द्वापर युग में कई शासक सत्ता, धन और प्रभाव के लिए युद्ध करते थे, लेकिन कुछ राजा न्यायप्रिय भी थे। कलियुग में धार्मिक और राजनीतिक नेता अक्सर अपने कर्तव्य से भटककर स्वार्थ और अपराध की ओर बढ़ गए हैं।

ज्ञान और धर्म - द्वापर युग में वेदों को चार भागों—ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में विभाजित किया गया और श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश दिया। कलियुग में धर्म के नाम पर छल, दिखावा और पाखंड बढ़ गया है।

आध्यात्मिक स्थिति - द्वापर युग में कुछ लोग ईश्वर से जुड़े रहे और भक्ति व कर्म का संतुलन था। कलियुग में अधिकांश लोग भौतिक लालच, अहंकार और स्वार्थ में उलझ गए हैं।

शांति और जीवन मूल्य- द्वापर युग में संघर्ष और युद्ध थे, फिर भी धर्म की रक्षा होती थी और मंदिरों का निर्माण हुआ। कलियुग में हिंसा, भ्रष्टाचार और पर्यावरण विनाश बढ़ गया है, जिससे संसार में अशांति और कष्ट अधिक हो गए हैं।

द्वापर युग वह काल था जब मानव जीवन में धर्म और अधर्म के बीच गहरा संघर्ष देखने को मिला। द्वापर युग की कथाएँ हमें यह स्मरण कराती हैं कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म का मार्ग छोड़ना नहीं चाहिए। अंततः विजय उसी की होती है, जो सत्य, न्याय और धर्म के मार्ग पर दृढ़ता से चलता है।

divider
Published by Sri Mandir·February 16, 2026

Did you like this article?

आपके लिए लोकप्रिय लेख

और पढ़ेंright_arrow
Card Image

आषाढ़ नवरात्रि 2026 कब है?

आषाढ़ नवरात्रि 2026 में कब है? जानिए इसकी सही तिथियां, माता दुर्गा की पूजा का महत्व, व्रत विधि और इस दौरान किए जाने वाले विशेष उपायों की पूरी जानकारी।

right_arrow
Card Image

कृष्ण जन्माष्टमी कब है?

कृष्ण जन्माष्टमी कब है और इसका क्या महत्व है? जानिए भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की तिथि, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, पौराणिक कथा, धार्मिक महत्व और इस पावन पर्व से जुड़ी विशेष मान्यताओं के बारे में।

right_arrow
Card Image

अष्टमी रोहिणी कब है?

अष्टमी रोहिणी कब है और इसका क्या धार्मिक महत्व है? जानिए अष्टमी रोहिणी व्रत की तिथि, पूजा का शुभ समय, भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी मान्यताएं, पूजा विधि और इस पावन पर्व की संपूर्ण जानकारी।

right_arrow
srimandir-logo

श्री मंदिर ने श्रध्दालुओ, पंडितों, और मंदिरों को जोड़कर भारत में धार्मिक सेवाओं को लोगों तक पहुँचाया है। 100 से अधिक प्रसिद्ध मंदिरों के साथ साझेदारी करके, हम विशेषज्ञ पंडितों द्वारा की गई विशेष पूजा और चढ़ावा सेवाएँ प्रदान करते हैं और पूर्ण की गई पूजा विधि का वीडियो शेयर करते हैं।

हमारा पता

फर्स्टप्रिंसिपल ऐप्सफॉरभारत प्रा. लि. 2nd फ्लोर, अर्बन वॉल्ट, नं. 29/1, 27वीं मेन रोड, सोमसुंदरपल्या, HSR पोस्ट, बैंगलोर, कर्नाटक - 560102
YoutubeInstagramLinkedinWhatsappTwitterFacebook