
मासी मागम 2025: मासी मागम के दिन पूजा और स्नान से पाएं पुण्य और आशीर्वाद। जानें तारीख और समय।
मासी मागम तमिल हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो तमिल महीने मासी (फरवरी-मार्च) की मागम नक्षत्र के दिन मनाया जाता है। इस दिन को विशेष रूप से दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन भक्तगण समुद्र, नदी या पवित्र सरोवर में स्नान कर भगवान शिव, मुरुगन और अन्य देवी-देवताओं की पूजा करते हैं।
मासी मागम एक तमिल हिन्दू त्यौहार है, जिसे 'मासी माकम' के नाम से भी जाना जाता है। ये पर्व, मुख्यतः दक्षिण भारतीय लोगों द्वारा मनाया जाता है। मासी मागम पर अलग-अलग तरह के अनुष्ठान और पूजा आदि करने की परंपरा है। इस दिन पवित्र नदियों या समुद्र में स्नान करना मनोवांछित फल देने वाला माना जाता है, साथ ही जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है।
तमिल पंचांग के अनुसार, मासी मागम त्यौहार हर वर्ष तमिल माह 'मासी' के 'माकम नक्षत्र' में मनाया जाता है, सामान्यतः माकम नक्षत्र पूर्णिमा तिथि पर पड़ता है, किन्तु हर बार ऐसा नहीं होता है। इसलिए ऐसा कहना उचित होगा कि मासी मागम पर्व पूर्णिमा तिथि पर नहीं, बल्कि 'मघा नक्षत्र' पर आधारित होता है। माकम नक्षत्र को 'मागम नक्षत्र' एवं 'मघा नक्षत्र' भी कहा जाता है। वर्ष 2025 में ये पर्व बुधवार, 12 मार्च को पड़ रहा है।
मासी मागम का त्यौहार मुख्य रूप से भारत के तमिलनाडु, केरल और पांडिचेरी में मनाया जाता है। ये पर्व कुंबकोणम और कुंडेश्वर मंदिर में पूरे विधि-विधान से मनाया जाता है। इसके अलावा सिंगापुर, थाईलैण्ड तथा इंडोनेशिया में भी भक्त बड़ी श्रद्धा के साथ ये त्यौहार मनाते हैं।
मासी मागम से संबंधित एक कथा में वर्णन मिलता है कि प्राचीन काल में तिरुवन्नामलाई के एक राजा हुआ करते थे। वो भगवान शंकर के परम भक्त थे। राजा का जीवन समस्त सुख-सुविधाओं और धन-धान्य से परिपूर्ण था, बस दुःख इस बात का था कि उनकी कोई संतान नहीं थी।
राजा को सदैव इस बात की चिंता रहती थी कि मरणोपरांत उनकी अंत्येष्टि क्रिया किसके द्वारा की जायेगी। ऐसे में भगवान शिव ने उनके मन की व्यथा समझकर वचन दिया- हे राजन्! निराशा त्याग दो! तुम्हारी मृत्यु के उपरांत मैं स्वयं तुम्हारा अंतिम संस्कार करूंगा।
कुछ समय पश्चात् मासी मागम के दिन राजा की मृत्यु हो गई, तब अपने दिए हुए वचन के अनुसार स्वयं शिव-शम्भू ने उनकी अंत्येष्टि क्रिया की, साथ ही ये आशीर्वाद दिया कि जो भक्त 'मासी मागम' के दिन किसी पवित्र नदी में स्नान करेंगे, उन्हें मरणोपरांत मोक्ष की प्राप्ति होगी।
मासी मागम से संबंधित एक और कथा भी प्रचलित है, जिसके अनुसार- एक बार कुछ ऋषि-मुनि अपने ज्ञान और विद्या पर अभिमान करने लगे थे। उन्हें ऐसा लगने लगा कि, वो सर्वज्ञाता हैं, और ऐसा समझकर मुनिगण देवताओं की उपेक्षा करने लगे। उन्होंने निर्णय किया कि अब वो ही मनुष्यों का मार्गदर्शन करेंगे, ऐसे में देवी-देवताओं की कोई आवश्यकता नहीं है। ऋषियों के इस विचार से जब भगवान शंकर अवगत हुए, तो उन्हें उन सब पर बहुत क्रोध आया और उन्होंने निश्चय किया कि ऋषियों को उनके अभिमान का बोध अवश्य कराएंगे।
इस प्रकार भगवान शिव एक दिन भिक्षुक का रूप धारण कर ऋषियों के समक्ष प्रकट हुए। अभिमान में अंधे हो चुके ऋषि उन्हें पहचान न सके और भगवान को शैतान मान उनका वध करने के लिए एक पागल हाथी भेजा। जैसे ही हाथी भिक्षुक बने भगवान शिव पर हमला करने के लिए आगे बढ़ा, कि तभी वो अंतर्ध्यान हो गए।
किन्तु पुनः प्रकट होकर भगवान शिव ने उस हाथी का वध कर दिया एवं उसकी खाल धारण कर ली। ये सब देखकर ऋषियों को अपनी भूल का आभास हुआ एवं उन सबने अभिमानवश किए गए देवताओं के अपमान के लिए भगवान शिव से क्षमा-याचना की। इसी कारण इस दिन को 'गज संहार' के रूप में भी मनाया जाता है।
दोस्तों, हमें आशा है कि इस लेख के माध्यम से आपको मासी मागम संबंधित संपूर्ण जानकारी मिल गई होगी। व्रत, त्यौहार व अन्य धार्मिक जानकारियों के लिए जुड़े रहिए श्री मंदिर पर।
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